Friday, January 29, 2010

नजरिए का फर्क

नजरिए का फर्क
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

वर्ष 2009 के अंत में रिलीज हुई फिल्म ‘‘थ्री इडियट्स’’ को बॉक्स आफिस पर जबरदस्त सफलता मिली। फिल्म को सफलता मिली तो स्वाभाविक रूप से फिल्म चर्चा के साथ-साथ विवादों में भी रही। ऐसे में मुझे फिल्म के बारे में बहुत सारी टिप्पणियां पढ़ने को मिली। कुछ तो अखबारों में, तो कुछ ईमेल व इंटरनेट के जरिये पढ़ने को मिली। मैने देखा कि कुछ ऐसे लोगों ने फिल्म पर टिप्पणी की है जो लेखक, शोधार्थी, समाजकर्मी या टिप्पणीकार तो हैं लेकिन फिल्मों पर टिप्पणी कभी-कभार ही करते हैं। उनमें सबसे रोचक टिप्पणी हमारे वरिष्ठ साथी श्रीपाद ने की है। श्रीपाद धर्माधिकारी के बारे में बताते चलें कि वे अस्सी के दशक के आईआईटी मुम्बई के प्रोडक्ट हैं, और करीब दो दशक तक नर्मदा एवं विभिन्न आंदोलनों से जुड़े रहने के बाद वर्तमान में ‘‘मंथन’’ अध्ययन केन्द्र के माध्यम से शोध एवं विश्लेषण में लगे हुए हैं। मंथन का विशेष फोकस अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, वैश्वीकरण एवं निजीकरण के फलस्वरूप होने वाले नवीनतम विकास के मुद्दों पर रहता है।

हां, तो श्रीपाद की टिप्पणी इसलिए रोचक हैं क्योंकि उन्होंने इसे अपने जीवन में देखे गए तमाम फिल्मों में से सबसे बेकार फिल्म की श्रेणी में रखा है। श्रीपाद इसे बेहूदा हरकतों वाली एक उबाऊ फिल्म मानते हैं। इस टिप्पणी के बाद मैं भी इस फिल्म पर टिप्पणी करने से खुद को नहीं रोक पाया। या यूं कह सकते हैं कि अन्य लोगों की ही तरह इस बहती गंगा में हाथ धोने के लोभ से खुद को रोक नहीं पाया। मैंने भी यह फिल्म देखी है। यह फिल्म मुझे लीक से हटकर लगी। इसलिए फिल्म के बारे में तमाम टिप्पणियों को मैने पढ़ा, लेकिन श्रीपाद के अलावा किसी ने भी फिल्म पर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है।

शिक्षाविद एवं आईआईपीएम के प्रमुख अरिंदम चैधरी जो कि मैनेजमेंट गुरू माने जाते हैं, उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि, ‘‘दुनिया के किसी भी हिस्से में शिक्षा तंत्र पर बनी तकरीबन सभी फिल्मों को देखने के बाद मैं कह सकता हूं कि मैंने इससे बेहतर फिल्म नहीं देखी है।’’ उनका मानना है कि लेखक नैतिकतावादी हुए बगैर विशुद्ध वाणिज्यिक अंदाज में लोगों तक एक सार्थक संदेश पहुंचाते हैं। वास्तव में इस फिल्म के जरिए हमारी शिक्षा व्यवस्था को चलाने वाले कई इडियट्स और इसे बगैर कोई सवाल किए अपनाने वाले लाखों इडियट्स को एक ठोस संदेश दिया गया है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हर्ष मंदर जी को एक विचारवान व सिद्धांतवादी समाजकर्मी के तौर पर जाना जाता है। वे मानते हैं कि, दोस्ती के शानदार उत्सव, लीक से हटकर और रचनात्मकता से भरी इस फिल्म ने जल्द ही पूरे देश का दिल जीत लिया। वे कहते हैं कि, इस फिल्म के लेखक अपने दर्शकों से जिंदगी के सार्वजनिक सबकों की बात करते हैं, लहरों के खिलाफ तैरने के साहस की बात करते हैं, वे उन बातों के बारे में कहते हैं, जो पैसे से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे ज्ञान प्राप्ति और परीक्षा में सफलता के बीच अंतर की बात कहते हैं। वे ये तमाम बातें बुद्धि, कोमलता और अंतर्दृष्टि के साथ करते हैं। वे लोकप्रिय सिनेमा के व्याकरण और मुहावरे का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन शरारत के साथ। ऐसा करते हुए वे एक मौलिक और विचारमान सिनेमा का सृजन करते हैं, लेकिन वह उपदेशात्मक नहीं है, वह मनोरंजन प्रधान है, लेकिन बेतुका नहीं है, वह विध्वंसकारी है, लेकिन दोषदर्शी नहीं है। कुल मिलाकर इसे वे फिल्मों में असली किरदारों की वापसी के नजरिए से देखते हैं।

फिल्मों के बारे में ज्यादातर गॉशिप पढ़ने को मिलता है। लेकिन कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो कि पूरी संवेदना के साथ भारतीय फिल्म के हर पहलू पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हैं, इनमें जयप्रकाश चौकसे का नाम प्रमुख है। इनका कहना है कि ‘थ्री इडियट्स’ की समीक्षा पारंपरिक मानदंडों पर नहीं की जानी चाहिए। यह फिल्म स्वतंत्र विचार शैली के महत्व को रेखांकित करते हुए घोटा लगाने वाली शास्त्रीयता के खिलाफ सार्थक विरोध प्रकट करती है। ‘कैसे कहा गया’ से ज्यादा महत्व ‘क्या कहा जा रहा है’ पर है। सदियों से व्यवस्थाएं स्वतंत्र सोच और निष्पक्ष विचार शैली को दबाकर ही अपनी सड़ांध और स्वार्थ को टिकाए रखे हैं, और यह फिल्म उनके गढ़ में विस्फोट करती है।

जहां तक फिल्म में चेतन भगत के किताब ‘‘फाइव प्वाइंट समवन’’ को श्रेय देने का विवाद है तो इसमें कोई दम नहीं है। सोचने वाली बात है कि फिल्म के बनने के बहुत पहले ही चेतन भगत को एक अनुबंध के जरिए रुपये 10 लाख का भुगतान कर दिया गया था, और उन्हें क्लोजिंग क्रेडिट देने पर सहमति हुई थी। फिल्म में उन्हें वह क्रेडिट दिया भी गया। लेकिन जब फिल्म चल निकली तो वे फिल्म में ओपनिंग क्रेडिट की बात करने लगे। यदि फिल्म फ्लॉप हो जाती तो क्या वे ऐसी मांग करते? इसके बावजूद सच तो यह है कि फिल्म किताब से बिल्कुल अलग है, और उनमें मात्र 10-12 फीसदी ही समानता है। यह किताब जबरदस्त फिलॉस्फी से भरी पड़ी है, और यह ज्यादातर आईआईटी के माहौल की डायरी की तरह है जो कि किसी शिक्षा तंत्र में बदलाव के लिए सोचने पर विवश नहीं करती है।

यदि हम अपने दायरे को और बड़ा करें तो हो सकता है कि श्रीपाद जैसे या कुछ भिन्न विचार वाले कुछ और लोग मिल जाएं। आखिर एक ही चीज पर सोच में इतना बड़ा अंतर क्यों है? इस बारे में मेरा मानना है कि यह ‘‘नजरिए का फर्क’’ है। नजरिए में इस फर्क का पहली बार अहसास मुझे सन 1993 में हुआ जब मैं रिलीज के पहले दिन फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ देखने पहुंचा। मेरी समझ से वह देशभक्ति की चासनी में लपेटी हुई एक अच्छी संगीत प्रधान फिल्म थी। लेकिन हाॅल में घुसने से पहले फिल्म देखकर निकल रहे दर्शकों से उनकी राय के बारे में पूछा। ज्यादातर दर्शकों ने काफी निराशाजनक टिप्पणी की थी। लेकिन पूरी फिल्म देखने के बाद पता चला कि रिलीज के पहले दिन फिल्म देखने आने वाले दर्शकों का नजरिया बिल्कुल अलग होता है। ऐसे दर्शक फिल्म से कुछ और ही उम्मीद करते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि किसी भी फिल्म को देखने के पहले बहुत बड़ी उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। यदि किसी फिल्म से बहुत ज्यादा उम्मीद कर ली जाय तो उसे देखने पर निराशा हाथ लगती है। लोगों के नजरिए में फर्क होने के कारण ही कई बार कुछ फिल्में एकल सिनेमा हाॅल में सफल होती हैं तो वे मल्टीप्लेक्स में नहीं चलती, और कई बार इसका उल्टा होता है। इसी नजरिए के फर्क के कारण सत्तर अस्सी के दशक के कई सफल निर्माता व निर्देशक आज लाचार नजर आते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया भर में बहुत बदलाव आए हैं। इन बदलावों ने जहां तकनीक को ज्यादा उन्नत बनाया है तो परिस्थिति के अनुसार लोगों का विचार भी बदला है। इसी वजह से सन 1975 में रिलीज हुई फिल्म ‘शोले’ या ‘जय संतोषी मां’ को जो जबरदस्त सफलता मिली वह शायद आज की परिस्थिति में न हो पाता। ज्यादातर फिल्में काल्पनिक कथाओं पर आधारित होती हैं, लेकिन कई बार उनमें यथार्थ का पुट होता है। यही यथार्थ का पुट उन्हें अन्य फिल्मों से अलग साबित करता है, और ऐसी फिल्में कई बार खास संदेश दे जाती हैं। किसी खास अंदाज में कहे गए ऐसे बहुतेरे संदेश या फिलॉस्फी का फंडा काफी बोरिंग लगता है तो कई लोगों के लिए वह सीख का विषय होती है। दादा साहब फाल्के ने कहा था कि जब सिनेमा अपने मनोरंजन तत्व से सामाजिक प्रतिबद्धता को निकाल देगा, तब वह महज तमाशा बनकर रह जाएगा। अनेक लोग आज तमाशा बना रहे हैं, लेकिन कुछ निर्माता या निर्देशक दर्शक के विश्वास को जीवित रखते हैं।

जहां तक मैं समझता हूं कि श्रीपाद जैसे लोग ऐसे माहौल में बड़े हुए हैं जहां उन पर जिंदगी थोपी नहीं गई है। जरा देश के उन लाखों बेबस युवाओं के बारे में भी विचार करें कि जिन्हें थोपी हुई हुई जिंदगी मिली है। स्कूलों में 12-13 साल गुजारने वाले ज्यादातर बच्चों को यह पता नहीं होता कि वे क्या पढ़ रहे हैं और इससे उनके जीवन में क्या बदलाव आने वाला है। शिक्षकों के मन में किसी के जीवन में थोड़ा भी बदलाव लाने या पढ़ाई को दिलचस्प बनाने का भाव नहीं होता है। अभिभावक भी अपने बच्चों के जरिए अपने अधूरे सपनों को पूरा करना चाहते हैं, और इस चक्कर में वे अपने बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहे हैं। इन तथाकथित सपनों को पूरा करने के लिए अभिभावक अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अंक हासिल करने की गलाकाट होड़ के लिए मजबूर करते हैं। यह ऐसी होड़ है जिससे किसी को फायदा नहीं होता है। अस्सी के दशक के आईआईटी कैंपस और आज के आईआईटी कैंपस में काफी फर्क आ चुका है, और शायद यह फर्क विचारों का है। इसीलिए आज के आईआईटी के छात्र गुनगुना रहे हैं, ‘‘गिव मी सम सनशाइन, गिव मी सम रेन, गिव मी अनदर चांस, आई वाना ग्रो अप वंस अगेन।’’ यदि हम नई पीढ़ी के इस नजरिए को समझने की कोशिश करें तो ‘‘थ्री इडियट्स’’ को बेहतर समझ पाएंगे।

See Shripad's Original Comment at: http://shripadblog.blogspot.com/


सम्पर्क:
फोन: 9868807129
ईमेल: bipincc@gmail.com

Monday, January 4, 2010

भारत के नियाग्रा का भाग्य

भारत के नियाग्रा का भाग्य


* बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी


अक्सर ऐसा होता है कि जो चीज आपके पास रहती है उसे हम अहमियत नहीं देते या उसमें हमारी रूचि उतनी नहीं रहती है। हम दूर के और खर्चीले चीजों पर ज्यादा आकृष्ट होते हैं। जहां तक मैं समझता हूं नियाग्रा फाल दुनिया में सबसे प्रसिद्ध प्रपातो में से एक है। जीं हां मैं उसी नियाग्रा फाल की बात कर रहा हूं जो कि कनाडा और यू.एस. के बीच बहने वाली नियाग्रा नदी पर स्थित है। जबरदस्त प्राकृतिक छटा से भरपूर फाल को देखने की चाहत हर प्रकृति प्रेमी को रहती है। इस प्राकृतिक स्थल को प्रचारित करने में यू.एस. सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। सन 2009 में करीब 2 करोड़ पर्यटक नियाग्रा फाल को देखने पहुंचे। लेकिन क्या आपको पता है कि उतनी ही प्राकृतिक छटा से भरपूर जगह हमारे देश में भी है जिसे देखने बहुत कम लोग जाते हैं। जी हां, भारत के केरल प्रांत में चालकुडी नदी पर स्थित अथिरापल्ली प्रपात की तुलना नियाग्रा फाल से की जा सकती है। चंचल ‘चालकुडी’ नदी से 80 फुट ऊंचाई से गिरते प्रपात की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है, जिसकी सुन्दरता यकीनन होश उड़ा देती है। इतना ही नहीं चालकुडी नदी के वाझाचल इलाके को राज्य में सबसे ज्यादा मछली घनत्व वाला क्षेत्र माना जाता है। यह क्षेत्र दुर्लभ प्रजाति के कछुओं का निवास स्थल है। इसके अलावा इंटरनेशनल बर्ड एसोसिएशन ने इस क्षेत्र को ‘प्रमुख पक्षी क्षेत्र’ घोषित किया है एवं वाईल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने इसे भारत के हाथियों के सर्वोत्तम संरक्षण प्रयास के तौर पर नामित किया है। लेकिन कहावत है कि घर की मुर्गी दाल बराबर। इसलिए हमारे देश की सरकारें ऐसे जगह को महत्व नहीं देना चाहती। ऐसा आरोप मैं इसलिए लगा रहा हूं क्योंकि केरल सरकार चालकुडी नदी पर एक पनबिजली परियोजना लगाना चाहती है। प्रस्तावित पनबिजली परियोजना से 163 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य है। यह बात सब जानते हैं कि बिजली पैदा करने के लिए नदी पर बांध बनाना पड़ता है और बांध बनने से नदी का प्रवाह नियंत्रित होता है। अब ऐसे मामलों पर तमाम विशेषज्ञ चिल्लाते रहते हैं लेकिन सरकार को शायद ही कभी फर्क पड़ता है। लेकिन इस बार देर से ही सही आखिर केन्द्र सरकार ने सही दिशा में सोचना शुरू किया। जी हां, केरल में प्रस्तावित अथिरापल्ली पनबिजली परियोजना पर ब्रेक लग गया। केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने गत 4 जनवरी 2010 को परियोजना को दी गई मंजूरी वापस लेने की सिफारिश कर दी। साथ ही मंत्रालय ने इस संबंध में केरल राज्य विद्युत बोर्ड से 15 दिनों में अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा है।


यह परियोजना केरल के चालकुडी शहर के 35 किमी पूरब में चालकुडी-अन्नामलाई अंतरराज्यीय राजमार्ग से सटे हुए त्रिसुर डिविजन के वाझाचल जंगल में प्रस्तावित है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार बांध 23 मीटर ऊंची एवं 311 मीटर चैड़ी होगी। यह बांध पेनस्टोक के माध्यम से नदी के पानी को टरबाइन में मोड़कर उच्च मांग अवधि में बिजली उत्पादन के लिए प्रस्तावित है। केरल में चालकुडी नदी पर प्रस्तावित इस 163 मेगावाट की पनबिजली परियोजना को जुलाई 2007 में केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने मंजूरी दी थी। केन्द्र ने अपनी मंजूरी रिवर वैली एंड हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्टस के विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा अप्रैल 2007 में परियोजना स्थल पर भ्रमण करने के बाद दी गई सिफारिश के बाद दी थी। जबकि विशेषज्ञों का दावा है कि इस पेनस्टोक में नदी का 86 प्रतिशत पानी मोड़ दिया जाएगा, इस तरह नदी में वाटरफाल के लिए पानी ही नहीं बचेगा। भारत के चालकुडी स्थित रिवर रिसर्च सेंटर की समन्वयक ए. लता के अनुसार, विशेषज्ञ समिति की सिफारिश में काफी कमियां हैं। इस परियोजना से कादर आदिवासियों के 80 परिवार गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि पर्यावरण मंत्रालय ने जब इतने शर्त तय कर दिए हैं तो परियोजना आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य नहीं रह गई है। परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद विशेषज्ञों एवं पर्यावरणविदों की ओर से जोरदार विरोध के स्वर उभरे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये 675 करोड़ की प्र्रस्तावित लागत से बनने वाली इस परियोजना से 138.6 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगा, इससे अथिरापल्ली का नैसर्गिक प्रपात सूख जाएगा और इलाके में रहने वाले आदिवासी परिवार गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।


इस परियोजना की कल्पना सबसे पहले सन 1998 में की गई थी। इसके लिए पोरिंगालकुथु बांध के अंतिम छोर के पानी को इस्तेमाल किए जाने का प्रस्ताव था। फरवरी 2000 में राज्य ने 138.6 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी। लेकिन व्यापक विरोध के कारण केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने में काफी देर कर दी, और वह मंजूरी भी शर्तों के आधार पर मिली। वास्तव में जुलाई 2007 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई मंजूरी शर्तों पर आधारित थी। इनमें आदिवासियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू करना, नदी से सिंचाई चैनल बंद करना, अथिरापल्ली वाटरफाल में नियमित न्यूनतम प्रवाह बनाए रखना, शिकार रोकने के उपाय करना और बांध की स्थापना से उत्पन्न हो सकने वाले पारिस्थितिकी बदलाव पर निगरानी करने के लिए निगरानी समिति की स्थापना के शर्त शामिल थे। इसके अलावा मंजूरी में निर्धारित अवधि में ही बिजली उत्पादन के लिए अनुमति दी गई थी, जो कि हर साल 1 फरवरी से 31 मई के बीच सायं 7 बजे से रात 11 बजे तक सिर्फ चार घंटे प्रतिदिन के लिए थी। मंत्रालय ने इस शर्त का प्रावधान खासकर इसलिए किया था ताकि कम प्रवाह वाले मौसम में उस क्षेत्र में आने वाले पर्यटकों का ध्यान रखा जा सके। शर्त में यह भी कहा गया था कि अथिरापल्ली वाटरफाल में प्रति सेकेंड 7.65 घनमी. का नियमित प्रवाह को बनाए रखने की प्राथमिकता के लिए जरूरत पड़ी तो बिजली बोर्ड को बिजली उत्पादन में समझौता करना चाहिए।


लेकिन तब से लेकर आज तक की परिस्थितियों में काफी बदलाव हो चुका है। अब केन्द्र सरकार ने सही दिशा में सोचना शुरू किया है लेकिन केरल सरकार परियोजना के निर्माण करने पर अड़ी हुई है। सवाल है कि जब यू.एस. सरकार नियाग्रा को बहुप्रचारित करके हर साल करोड़ो पर्यटकों को आकर्षित करके करोड़ो डाॅलर बटोर सकती है तो भारत सरकार अथिरापल्ली के लिए ऐसा क्यों नहीं करना चाहती? भारत में प्राकृतिक पर्यटन को अब तक उतना महत्व नहीं मिला है जितना मिलना चाहिए। नियाग्रा में आने वाले पर्यटकों से जितनी आय होती है उसका दस फीसदी भी अथिरापल्ली से नहीं होता है। इस मामले को औद्योगिक विकास बनाम प्रकृति के नजरिये से देखने के बजाय एक व्यापक नजरिये से देखने की जरूरत है। इस व्यापक नजरिये में सबसे महत्वपूर्ण है नदी को नदी बनाए रखा जाए, अर्थात नदी को बहने की पूरी आजादी दी जाए। अब पर्यावरण मंत्रालय के इस नये कदम से पर्यावरणवादियों एवं वन्यजीव प्रेमियों को एक उम्मीद जगी है कि जैवविविधता के मामले में भारत के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में से एक इस वाझाचल वन क्षेत्र के जैवविविधता को कायम रखा जा सकेगा और नदी का नियमित प्रवाह कायम रह पाएगा। इस तरह भारत के नियाग्रा के बचे रहने की उम्मीद अभी बाकी है।




Tags: Athirapalli, Kerala, Thrisur, Hydropower, MoEF, Waterfall, Chalkudy, River, Wazachal


Published in: http://hindi.indiawaterportal.org/node/5979

Tuesday, December 22, 2009

कितना दहशत फैलाना ठीक है!

कितना दहशत फैलाना ठीक है!

  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

जी हां, यह सवाल मेरे जेहन में आया कि किस स्तर तक दहशत फैलाना ठीक होगा? यहां पर मैं कोई बालीवुड या हालीवुड की कोई डरावनी फिल्म की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि मैं तो सिर्फ एक टिप्पणी पर टिप्पणी करना चाहता हूं। यह टिप्पणी हमारे देश के पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश ने की है। यह टिप्पणी उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट को खारिज करते हुए की है जिसमें हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पूरी तरह गायब हो जाने का दावा किया गया है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) की 2007 की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालय के ग्लेशियर दुनिया में सबसे तेजी से पिघलने वाले ग्लेशियर हैं। अगर यही हाल रहा तो 2035 तक या इससे पहले वे पूरी तरह गायब हो जाएंगे। इस रिपोर्ट के जवाब में जयराम रमेश ने कहा कि इतनी दहशत फैलाने की जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं केन्द्रीय मंत्री ने आईपीसीसी की रिपोर्ट पर सवालिया निशान लगाते हुए हिमालय के ग्लेशियरों पर एक अलग रिपोर्ट जारी की है। इस नयी रिपोर्ट ‘‘हिमालयन ग्लेशियर्स: ए स्टेट आॅफ दि आर्ट रिव्यू आॅफ ग्लेशियर स्टडीज, ग्लेशियर रिट्रीट एंड क्लाइमेट चेंज’’ को भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक वी. के. रैना ने तैयार किया है। मंत्री ने दावा किया है कि हिमालय के ग्लेशियरों में ऐसी कोई असमान्य स्थिति नहीं दिख रही है, जिससे लगे कि वे कुछ ही दशक में गायब हो जाएंगे।

अब सवाल यह उठता है कि एक ही बात के लिए दो रिपोर्ट मौजूद हैं और दोनों एक दूसरे के विपरीत दावे कर रहे हैं तो किसे सही माना जाय? या तो इस मामले पर कोई एक पक्ष झूठ बोल रहा है या तो उनके अध्ययन का तरीका ही गलत है। दोनों ही परिस्थिति में नुकसान तो हमारा ही है। चलिए हम भारत के पर्यावरण मंत्रालय के दावे पर एक नजर डाल लेते हैं। जयराम रमेश ने कहा कि छह साल पहले तक गंगोत्री ग्लेशियर प्रति वर्ष 22 मीटर की दर से घट रहा था, लेकिन 2004-05 में यह दर 12 मीटर रही। वर्ष 2007 से लेकर इस साल के मध्य तक ग्लेशियर यथावत ही हैं। उन्होंने इस आशंका को भी खारिज किया कि गलेशियर घटने से गंगा और अन्य हिमालयी नदियां सूख जाएंगी। उनका यह भी कहना है कि हिमालय के ग्लेशियरों की अंटार्टिक ग्लेशियर से तुलना ठीक नहीं है, क्योंकि हिमालय के ग्लेशियर ज्यादा ऊंचाई पर हैं। अपने दावे के पक्ष में उन्होंने कई उदाहरण भी दिए हैं। इनमें प्रमुख रूप हिमालय के पूर्वी और पश्चिमी ग्लेशियरों में पिछले कुछ वर्षों में परिवर्तन की दर को मुख्य आधार मानते हुए दो साल का अवलोकन शामिल है। अब मोटी सीे बात यह है कि ये बाते हमारे देश के अधिकारिक विभाग के माध्यम से कहा जा रहा है तो फिर आईपीसीसी के रिपोर्ट पर ही सवाल उठते हैं!

चलिए अब आईपीसीसी के पक्ष पर भी विचार करते हैं। जयराम रमेश के दावे को तो सबसे पहले आईपीसीसी प्रमुख ने ही खारिज कर दिया है। यह बात काफी दिलचस्प है कि आईपीसीसी के प्रमुख और कोई नही बल्कि भारत और खासकर भारत के हिमालयी क्षेत्र नैनीताल में जन्में आर. के. पचैरी हैं। वे जलवायु परिवर्तन पर हमारे देश के प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद में सदस्य हैं। इसके अलावा भारत के एक महत्वपूर्ण संस्थान दि एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) के महानिदेशक हैं। इतना ही नहीं वे भारत के चुनिंदा नोबल पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों मे से एक हैं। उनका कहना है कि आईपीसीसी के हजारो वैज्ञानिकों के शोध को रैना ने मात्र दो साल के अवलोकन के आधार ठुकरा दिया है जो कि जल्दबाजी वाली बात है। इसके अलावा आईपीसीसी की रिपोर्ट ठोस वैज्ञानिक एवं प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर तैयार किए गए हैं, जबकि भारत की सरकारी रिपोर्ट में ज्यादातर द्वितीयक आंकड़ों का सहारा लिया गया है।

इतना ही नहीं जयराम रमेश के दावे के विपरीत भारत की एक पर्यावरणीय संगठन ‘रिसर्च फांउडेशन फाॅर सांइस टेक्नाॅलाजी एंड इकोलाजी’ ने अपने नवीनतम शोध के आधार पर दावा किया है कि पिछले कुछ दशक में उत्तराखंड की 34 प्रतिशत जलधाराएं अब मौसमी बन चुकी हैं। जल की निकासी में 67 प्रतिशत तक कमी आई है। रिसर्च फांउडेशन की प्रमुख डा. वंदना शिवा का कहना है कि सरकारी रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल समस्या को केवल तापमान वृद्धि तक ही सीमित कर दिय गया है। हालांकि रिपोर्ट में मौसमी बर्फबारी व ग्लेश्यिरों के खिसकने की बात स्वीकार की गई है। बावजूद इसके पर्यावरण मंत्री यह दावा कर रहे हैं कि हिमालय के ग्लेशियर पिघल नहीं रहे हैं। इन सबके बावजूद सरकारी रिपोर्ट के दावों में ही आपसी विरोधाभास स्पष्ट दिखता है।

हालांकि सरकार अपने रिपोर्ट को रक्षा विभाग से जोड़कर और उसे गोपनीय बताकर इसे सावर्जनिक नहीं कर रही है। ऐसे में रिपोर्ट को कुछ सरकारी लोगों द्वारा ही अवलोकन करके बड़े बड़े दावे करना कितना उचित है? अब सवाल उठता है कि क्या इन विरोधाभासी बातों में किसी का निहित स्वार्थ है? सवाल है कि रिपोर्ट ऐसे समय जारी की गई है जब कोपेनहेगन में 7 से 18 दिसम्बर 2009 तक संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होने वाला है। तो ऐसा तो नहीं कि भारत सरकार के प्रतिनिधि सम्मेलन में जो अपना पक्ष रखने चाहते हैं उसके पूर्व तैयारी के तौर पर ही ऐसे बयान सार्वजनिक किए जा रहे हैं। हो सकता है कि ऐसे बयान से भारतीय पक्ष को सुविधा हो सकती है, लेकिन भारत के हिमालयी क्षेत्र के निवासी जो प्रत्यक्ष रूप से संकट का सामना कर रहे हैं उससे कौन निजात दिलाएगा? पर्यावरण सम्बंधी ऐसे महत्वपूर्ण रिपोर्ट के आंकड़ों को ही आधार बनाकर दुनिया भर के शोधार्थी छोटे-छोटे स्तर पर शोध करते हैं, क्योंकि इतने व्यापक स्तर पर शोध करना किसी छोटी संस्था या व्यक्ति के औकात से बाहर की बात है। जब बड़े शोध में ही आपस में विरोधाभास हो तो फिर द्वितीयक आंकड़े के तौर पर इनकी क्या प्रासंगिकता रह जाती है? यह बात तो जग जाहिर है कि दुनिया के हरे देशों में प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है, क्योंकि उस समय ज्यादातर ऐतिहासिक घटनाओं का सिलसिलेवार दस्तावेजीकरण नहीं किया था। ऐतिहासिक सन्दर्भों में विरोधाभास तो मौजूदा विचारधारा के विरोधाभास के कारण भी होता है। लेकिन क्या पर्यावरणीय मुद्दों पर भी विचारधारा में अंतर की वजह से ऐसा विरोधाभास है?

बात चाहे कुछ भी हो आखिर दोनो स्थितियों में नुकसान तो आम लोगों का ही है। भागीरथी, मंदाकिनी, यमुना एवं अलंकनंदा घाटियों में पर्यावरणीय संकट के असर दिखने शुरू हो चुके हैं। इन इलाकों में चारों एवं पशुओं की संख्या बहुत तेजी से घट रही है। जिन जगहों में साल के ज्यादातर समय बर्फ बिछी रहती थी वहां के जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम हो चुकी हैं। गंगोत्री अपने मूल स्थान से पीछे हट चुकी है। पहाड़ी फलों पर गर्मियों के असर के कारण उन्हें अब दो हजार मीटर ऊपर लगाया जा रहा है। हिमालयी क्षेत्र के निवासी इन परिस्थितियों का सामना करते हुए दहशत में जी रहे हैं। लेकिन हमारे देश के पर्यावरण मंत्री कहते हैं कि इतनी दहशत फैलाने की जरूरत नहीं है। तो ठीक है आप ही बताएं कि कितने दहशत में रहना ठीक है? माननीय जयराम रमेश जी, अब बस कीजिए। लोगों को बहलाना बंद करें और सच का समाना करें और समस्या का हल खोजना शुरू करें। बहुत भला होगा यदि भारत के प्रतिनिधि कोपेनहेगन सम्मेलन में सच स्वीकार करके समस्या के हल के लिए दुनिया का आह्वान करें। नहीं तो इतनी देर हो चुकी होगी कि परिस्थिति किसी के काबू में नहीं रहेगी।

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, 30 नवम्बर 2009)

Tags: Environment, Jairam Ramesh, Glacier, Himalaya, recede, Pachauri, TERI





क्या प्रदान किया गया पुरस्कार भी वापस हो सकता है?


क्या प्रदान किया गया पुरस्कार भी वापस हो सकता है?

  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
भारत के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई वाकया सुनने को मिलता हो जब किसी प्रमुख संगठन, संस्था या कंपनी को दिया गया पुरस्कार वापस लेने की सिफारिश की गई हो। लेकिन शायद ऐसा पहली बार होने की उम्मीद है। वह भी भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए गए पर्यावरण उत्कृष्टता पुरस्कार के मामल में। जी हां, भारत में सन 2009 के लिए पर्यावरण उत्कृष्टता पुरस्कार एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनएचपीसी लिमिटेड को प्रदान किया गया था। लेकिन जिस परियोजना को आधार मानकार एनएचपीसी को इस पुरस्कार के लिए चुना गया था, वह आधार ही झूठा निकला। एनएचपीसी भारत की एक प्रमुख सार्वजनिक कंपनी है और देश भर में सबसे ज्यादा पनबिजली परियोजनाएं स्थापित करने वाली कंपनी है।

दि एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के पर्यावरण उत्कृष्टता पुरस्कार 2009 की जूरी पैनल (निर्णायक मंडल समिति) ने एनएचपीसी लिमिटेड को पर्यावरण उत्कृष्टता के लिए 5 जून 2009 को दिया गया पुरस्कार वापस लेने का फैसला किया है, ऐसा महत्वपूर्ण सूत्रों से पता चला है। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रशांत भूषण एवं बांधो, नदियों एवं लोगों का दक्षिण एशिया नेटवर्क (सैण्ड्रप) सहित कई लोगों और संगठनों ने जूरी को 17 अगस्त 2009 को यह कहते हुए पत्र लिखा था कि अवार्ड देने के लिए जिस परियोजना (जम्मू एवं कश्मीर में उरी पनबिजली परियोजना) का हवाला दिया गया था उस परियोजना में अपने कार्य प्रदर्शन के आधार पर एनएचपीसी अवार्ड के योग्य नहीं है। इसके अलावा, कंपनी के सामाजिक व पर्यावरणीय मुद्दों पर निराषाजनक ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए भी वह एक पर्यावरण उत्कृष्टता अवार्ड के योग्य नहीं है।

सैण्ड्रप के समन्वयक श्री हिंमाशु ठक्कर के अनुसार उरी पनबिजली परियोजना में एनएचपीसी के कार्य प्रदर्शन और इस मुद्दे पर एनएचपीसी एवं टेरी द्वारा तैयार केस स्टडी एवं परियोजना को कोष प्रदान करने वाली स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (सीडा) द्वारा की गई समीक्षा सहित अन्य अधिकृत दस्तावेजों के विस्तृत अध्ययन के बाद ही एनएचपीसी को अवार्ड देने का विरोध करते हुए पत्र लिखा गया।

इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस (यानी 5 जून 2009) पर, एक बहु-प्रचारित कार्यक्रम में, भारत की राष्ट्रपति ने पर्यावरणीय उत्कृष्टता और कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के लिए विभिन्न विजेताओं को टेरी पुरस्कार प्रदान किया। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा एवं टेरी के महानिदेशक डा. आर. के. पचैरी के नेतृत्व वाली अवार्ड की जूरी और भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की उपस्थिति में, एनएचपीसी ने श्रेणी -।।। (रुपये 1000 करोड़ से ज्यादार कारोबार वाली कंपनियों के लिए) के लिए प्रथम पुरस्कार हासिल किया। अवार्ड ‘‘एनएचपीसी के केस स्टडी पोस्ट कंसट्रक्शन इनवायर्मेंटल एंड सोशल इंपैक्ट असेशमेंट स्टडी आॅफ 480 मेगावाट उरी पाॅवर स्टेशन इन जम्मू एंड कश्मीर’’ के लिए दिया गया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पत्र मिलने के बाद जूरी पैनल ने मिलकर पत्र में उठाए गए मुद्दों पर टेरी एवं एनएचपीसी की प्रतिक्रिया की जांच की। ऐसा लगता है कि जूरी पैनल ने एनएचपीसी को पुरस्कार देने के निर्णय पर पुनर्विचार करने का फैसला किया है। टेरी के कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया है कि एनएचपीसी ने जिस तरह सार्वजनिक पटल पर पुरस्कार का इस्तेमाल किया उस पर भी जूरी ने नाखुशी जाहिर की। यह उल्लेखनीय है कि एनएचपीसी के शेयरों के प्रारंभिक प्रस्ताव के विज्ञापन में, कंपनी ने इस अवार्ड को इस तरह से गुमराह करते हुए इस्तेमाल किया जैसे कि कंपनी को पर्यावरण संरक्षण के समग्र उत्कृष्टता के लिए पुरस्कृत किया गया हो।

शेयर बाजार में जब कोई नया शेयर प्राथमिक रूप से अधिसूचित होता है तो उसे कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इनमें निवेशकों से शेयर में निवेश के लिए विज्ञापन देन प्रमुख है। जाहिर है कि कंपनियां शेयर के लिए दिये जाने वाले विज्ञापनो में अपनी उपलब्धि का गुणगान करती है। आम निवेशकर्ता उन्हीं विज्ञापनों के आधार पर निवेश करते हैं। लेकिन यदि ऐसे गुणगान के आधार पर जब शेयर निवेशकर्ताओं को आबंटित हो जाय और शेयर पूंजी बाजार में अधिसूचित हो जाय तब उसके बाद बता चले कि सारी बातें खोखली हैं तो निवेशकों का विश्वास टूटता है।

दुर्भाग्यवश इस मुद्दे पर टेरी ने कोई सर्वाजनिक वक्तव्य नहीं जारी की है। टेरी ने लिखे गए पत्र की सिर्फ स्वीकृति दी और विस्तृत जांच का आश्वासन दिया है लेकिन सितंबर माह के अंत तक कोई जवाब नहीं दिया है। हम देखते हैं कि एनएचपीसी ने अवार्ड लेने के लिए न सिर्फ गलत तस्वीर पेश की बल्कि वह जूरी पैनल एवं अवार्ड को कलंकित करने के लिए भी दोषी है। जब भारत की राष्ट्रपति इस अवार्ड को देने में शामिल रही हैं तो, एनएचपीसी सर्वोेच्च पद को एवं पुरस्कार समारोह में शामिल महत्वपूर्ण लोगों को विवाद में घसीटने के लिए भी दोषी है। इसी तरह, टेरी भी यथोचित जानकारी हासिल न करने एवं जूरी पैनल को गुमराह करने की दोषी है। वास्तव में टेरी के वेबसाइट में उपलब्ध एनएचपीसी पर टेरी की केस स्टडी में एनएचपीसी द्वारा किए गए दावे के समय, महत्व एवं विवरणों की समझ इतनी गलत है जैसे कि लगता है टेरी के सदस्यों ने एनएचपीसी के सभी दावों को बगैर आशंका के स्वीकार कर लिया है। यहां पर मामला आपसी हितों का भी है, क्योंकि टेरी ने हाल के सालों में एनएचपीसी से रुपये 1 करोड़ से ज्यादा का कोष प्राप्त किया है। यह आपसी हित स्वतंत्र जूरी सदस्यों के लिए मायने नहीं रखती है, लेकिन यह जूरी पैनल में शामिल टेरी के सदस्यों और यथोचित अभ्यास करने वाले टेरी के सदस्यों के संदर्भ में निश्चत तौर पर मायने रखती है। हालांकि, जब हम इसे लिख रहे हैं, तब तक टेरी ने अपने वेबसाइट में पुरस्कार विजेताओं की सूची से एनएचपीसी का नाम नहीं हटाया है, लेकिन उम्मीद करते हैं कि टेरी जल्द ही उसे हटाएगी।

चूंकि यह मामला महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित का है, और यह मुद्दा करीब डेढ़ माह पहले उठाया गया था, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि टेरी अवार्ड की स्थिति को स्पष्ट करते हुए तत्काल इस मुद्दे पर स्पष्ट सार्वजनिक वक्तव्य जारी करे। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे मामले पर स्वतंत्र संगठन व व्यक्तियों द्वारा आपत्ति दर्ज की गई। इस तरह देश में तमाम कंपनियां शेयर बाजार में अपने को ऊंचा उठाने के लिए निवेशकों को गुमराह करती हैं। ऐसे में क्या सेबी जैसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि निवेशकों के साथ धोखाधड़ी न हो और पूंजी बाजार में उनका विश्वास कायम रहे।

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, 12 अक्तूबर 2009)

बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के कार्य प्रदर्शन की चैकाने वाली कहानी

बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के कार्य प्रदर्शन की चैकाने वाली कहानी
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
भारत में इस साल अभूतपूर्व सूखा पड़ा है। सूखे की स्थिति उन राज्यों मे भी काफी व्यापक रही है जहां सिंचाई का नेटवर्क मौजूद है। ऐसे राज्यों में आजादी के बाद से आज तक बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के लिए काफी रकम खर्च किए गए हैं। फिर भी उन परियोजनाओं के माध्यम से आम किसानों को सिंचाई का लाभ नहीं मिल पाया है। आइए इसके पीछे के कारणों को जानने की कोशिश करते हैं।

भारत में सिंचाई परियोजनाओं के कार्य प्रदर्शन के बारे में दिल्ली स्थित संस्था ‘सैण्ड्रप’ के हिमांशु ठक्कर एवं स्वरूप भट्टाचार्य ने पिछले 15 सालों के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एक अध्ययन किया है। अध्ययन के नतीजे काफी चैकाने वाले हैं। सन 1991-92 से सन 2006-07 (नवीनतम वर्ष जब तक के आंकड़े उपलब्ध हैं) तक के 15 सालों में, राज्यों से प्राप्त वास्तविक जमीनी आंकड़ों पर आधारित केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकृत आंकड़ो के अनुसार बड़ी और मध्यम स्तर की सिंचाई परियोजनाओं से शुद्ध सिंचित इलाकों (नेट इरिगेटेड एरिया) में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। पूरे देश में नहरों द्वारा शुद्ध सिंचित इलाके 1991-92 में 1.779 करोड़ हेक्टेअर थे जो सन 2006-07 में घटकर 1.535 करोड़ हेक्टेअर रह गए। अप्रैल 1991 से मार्च 2007 तक, देश ने नहरों द्वारा सिंचित इलाकों में बढ़ोतरी के लक्ष्य से बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं पर 130,000 करोड़ रुपये खर्च किया है। जबकि वास्तविकता यह है कि इस अवधि में इन परियोजनाओं से सिंचित इलाकों में 24.40 लाख हेक्टेअर की जबरदस्त कमी आयी है। एक तरफ तो इन आंकड़ो की सच्चाई है तो दूसरी तरफ हमारे जल संसाधन मंत्रालय का दावा है कि देश में सिंचित इलाकों में बढ़ोतरी हुई है। आखिर इस विरोधाभास के क्या मायने हैं?

सैण्ड्रप के समन्वयक एवं जल विशेषज्ञ श्री हिमांशु ठक्कर का कहना है कि सम्पूर्ण भारत के शुद्ध और सकल सिचिंत इलाके में यह बढ़ोतरी भूजल द्वारा सिंचित इलाके में बढ़ोतरी के कारण संभव हुआ है, जो सन 1990-91 में 2.469 करोड़ हेक्टेअर से बढ़कर सन 2006-07 में 3.591 करोड़ हेक्टेअर हो गया। वास्तव में भूजल से सिंचित इलाकों में बढ़ोतरी ने जल संसाधन मंत्रालय को बड़े बांधों के अक्षम कार्य प्रदर्शन की सच्चाई को छिपाने में मदद की है। सन 1990-91 में समस्त स्रोतों से शुद्ध सिंचित इलाका 4.802 करोड़ हेक्टेअर था जो कि 2006-07 में बढ़कर 6.086 हेक्टेअर हो गया है। इसी तरह इस अवधि में समस्त स्रोतों से सकल सिंचित इलाके बढ़ रहे हैं। यदि किसी इलाके में साल में दो फसल लिए जाते हैं तो सकल सिंचित इलाके में इसे दो बार गिना जाएगा, जबकि शुद्ध सिंचित इलाके में इसे एक बार गिना जाएगा। बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं से सिंचित इलाकों में कमी गंभीर चिंता की वजह होनी चाहिए और जल संसाधन मंत्रालय, विभिन्न राज्यों एवं योजना आयोग को कुछ कड़े सवालों का जवाब देना होगा। लेकिन जल संसाधन मंत्रालय, योजना आयोग एवं अन्य सभी अधिकृत एजेंसियों को हमारे जल संसाधन निवेश का ज्यादातर हिस्सा लगातार बड़ी सिचाई परियोजनाओं में खर्च करने की मूर्खता का एहसास नहीं है। मौजूदा जारी 11वी पंचवर्षीय योजना सहित हमारी सभी पंचवर्षीय योजनाओं में जल संसाधन विकास के पूरे बजट का करीब दो तिहाई बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के लिए उपयोग किया गया है।

इस अवधि में, जल संसाधन मंत्रालय दावा करती रही है कि देश ने 1.05 करोड़ हेक्टेअर की अतिरिक्त सिंचाई क्षमता तैयार कर ली है और 78.2 लाख हेक्टेअर अतिरिक्त उपयोग क्षमता तैयार कर ली है। यह दावा 11वीं योजना के लिए जल संसाधन के कार्यसमूह की रिपोर्ट और बाद अतिरिक्त जानकारी में किया गया है। लेकिन अधिकारिक आंकड़े साबित कर रहे हैं कि दावे कितने खोखले रहे हैं। जल संसाधन मंत्रालय ऐसे दावे बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के निवेश में और ज्यादा आबंटन की मांग के लिए करती रही है। मंत्रालय ने प्रस्ताव किया है कि निर्माणाधीन बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के लिए 11वीं योजना में रुपये 165900 करोड़ आबंटित किया जाना चाहिए। मौजूदा तथ्य साबित करते हैं कि इस तरह सार्वजनिक धन की पूरी तरह बरबादी की संभावना है।
इस अवधि में नहरों से चार प्रमुख राज्यों (आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और जम्मू एवं कश्मीर) के सकल (एवं शुद्ध) सिंचित इलाकों के लिए उपलब्ध आवश्यक आकड़े इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं कि यहां तक कि नहरों से होने वाले सकल सिंचित इलाकंों में भी गिरावट आ रही है, जबकि इन सालों में पूरे देश के सकल सिंचित इलाकों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सन 1991 से 2007 की अवधि में (2002 एवं 2004 के संभावित अपवाद को छोड़कर) ज्यादातर सालों में बारिश की स्थिति सामान्य से बेहतर रही है। इसलिए यह दावा नहीं किया जा सकता कि यह प्रवृत्ति कम वर्षा की वजह से है।

इस परिस्थिति के लिए कुछ वजहों में शामिल हैं जलाशयों एवं नहरों में गाद जमा होना, सिंचाई अधोसंरचना के रखरखाव का अभाव, नहरों के शुरूआती इलाकों में ज्यादा पानी खपत वाले फसले लेना और नहरों का न बनना और एक नदीघाटी में जरूरत से ज्यादा (वहन क्षमता से ज्यादा) परियोजनाएं बनना, जल जमाव व क्षारीयकरण, पानी को गैर सिंचाई कार्यो के लिए मोड़ना, भूजल दोहन का बढ़ना। कुछ लोगों द्वारा एक वजह बतायी जाती है: बढ़ी हुई वर्षा जल संचयन। कुछ मामलों में, नये परियोजनाओं से बढ़ने वाले इलाके आंकड़ों में परिलक्षित नहीं होते हैं क्योंकि पुरानी परियोजनाओं से सिंचित इलाके (उपरोक्त कारणों से) कम हो रहे हैं। वास्तव में विश्व बैंक की 2005 की रिपोर्ट ‘‘इंडियाज वाटर इकाॅनामीः ब्रैसिंग फाॅर ए टर्बुलेंट फ्यूचर’’ ने स्पष्ट किया है कि भारत के सिंचाई अधोसंरचनाओं (जो कि दुनिया में सबसे बड़ी है) के रखरखाव के लिए सलाना वित्तीय आवश्यकता रुपये 17,000 करोड़ है, लेकिन इसके लिए इस रकम का 10 प्रतिशत से भी कम उपलब्ध है और उनमें से ज्यादातर का अधोसंरचनाओं के भौतिक रखरखाव के लिए उपयोग नहीं होता है। कुछ अति-विकसित नदीघाटियों में, नई परियोजनाएं कुछ भी बढ़ोतरी नहीं करती, क्योंकि वे कुछ डाउनस्ट्रीम इलाकों (बांध के नीचे के इलाके) के पानी को छीन रही होती हैं।

इन निष्कर्षों के गंभीर निहितार्थ हैं। पहली बात, ये बहुत स्पष्ट तौर पर साबित करते हैं कि देश में हर साल बड़ी सिंचाई परियोजनाओं पर खर्च होने वाले हजारो करोड़ से शुद्ध सिंचित इलाकों में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। दूसरी बात, यह कि सिंचित इलाकों में वास्तविक बढ़ोतरी भूजल से होने वाली सिंचाई से हो रही है और भूजल सिंचित खेती की जीवनरेखा है। हिमांशु ठक्कर का मानना है कि इससे बहुत सारे जावबदेही के सवाल उठते हैं: इन गलत प्राथमिकताओं को तय करने के लिए कौन जिम्मेदार है और इनके परिणाम क्या होंगे? यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि नये बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के लिए पैसे खर्च करने के बजाय, यदि हम मौजूदा अधोसंरचनाओं के मरम्मत एवं उपयुक्त रखरखाव में, जलाशयों में गाद को कम करने के उपाय में, साथ ही वर्षा जल संचयन, भूजल रिचार्ज एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों में ध्यान देने में रकम खर्च करते हैं तो देश को ज्यादा फायदा होगा। भूजल के मामले में, हमें मौजूदा भूजल को सुरक्षित रखने और उसके संवर्धन को उच्च प्राथमिकता देने की जरूरत है।

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, 05 अक्तूबर 2009)

लोकतंत्र को ठेंगा दिखाती मणिपुर सरकार

लोकतंत्र को ठेंगा दिखाती मणिपुर सरकार
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
देश की राजधानी या किसी अन्य बड़े शहर में रहते हुए बहुत सारे महत्वपूर्ण समाचारों पर कई बार हमारी नजर नहीं जा पाती है। इनमें से कई समाचार ऐसे होते हैं जो कि देश या किसी राज्य की पूरी व्यवस्था को झकझोरते हैं। ऐसी ही एक घटना हाल ही में हमारे पूर्वोत्तर में स्थित मणिपुर में घटित हुई है। हुआ यह कि गत 14 सितंबर को मणिपुर में आठ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार व्यक्तियों में एशिया पेसिफिक इंडिजिनियस यूथ नेटवर्क (एपीआईवाईएन) के समन्वय समिति के सदस्य जितेन युन्मन के अलावा आल मणिपुर यूनाइटेड क्लब आॅर्गनाइजेशन के सात सदस्य (एएमयूसीओ) सुंगचेन कोईरेंग, लिकमैबम टोंपोक, ए सोकेन, इराम ब्रोजन, टोआरेम रामदा, जी शरत काबुई एवं थियम दिनेश प्रमुख है।

अब सवाल उठता है कि इनलोगों ने क्या अपराध किया है? तो जवाब है कि अभी तो कोई अपराध नहीं किया है लेकिन फिर भी उन पर गंभीर आरोपों वाली धारायें लगायी गई हैं। इनमें आईपीसी की धारा ‘121/121 ए’, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा ‘16/18/39’ और सरकारी गोपनीयता अधिनियम की धाारा ‘ओ’ प्रमुख हैं। इसका मतलब है कि इन लोगों पर सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का प्रयास, सरकार के खिलाफ साजिश करने, गैरकानूनी गतिविधियों को मदद करने का आरोप है। अब यदि आरोप है तो इनके खिलाफ सबूत भी पेश किए जाने चाहिए, लेकिन इसके लिए राज्य सरकार बाध्य नहीं है। इसका मतलब है कि क्या हमारे देश में किसी को बगैर आरोप के लम्बे समय तक जेल में रखा जा सकता है तो, जवाब है कि हां ऐसा संभव है। हमारे देश में कुछ राष्ट्रीय तो कुछ राज्य स्तर के कानून ऐसे हैं जिनमें किसी आरोपी को दोष सिद्ध किए बगैर काफी समय तक जेल में रखा जा सकता है। इन कानूनों में मणिपुर सहित पूर्वोत्तर के कुछ अन्य राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफ्सपा) प्रमुख है। हालांकि इन गिरफ्तार कार्यकर्ताओं पर इस कानून की धाराएं तो नहीं लगायी गई हैं लेकिन भविष्य में इसकी संभावना जरूर है।

अब सवाल उठता है इन लोगों ने ऐसा क्या किया है जिससे सरकार को खतरा पैदा हो गया है। इसका जवाब इन लोगों की पृष्ठभूमि देखने से मिल जाता है। जितेन युन्मन एपीआईवाईएन के संस्थापक सदस्य होने के अलावा सिटीजेन कंसर्न आॅन डैम्स एंड डेवलेपमेंट (सीसीडीडी) के संयुक्त सचिव भी हैं। वे राज्य में विभिन्न मानवाधिकार मुद्दे पर काफी समय से कार्यरत है और राज्य के सैन्यीकरण के खिलाफ हैं। इन्होंने राज्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचने के नाम पर प्रस्तावित विभिन्न बड़े बांधो की सच्चाई को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सामने रखा है। इन्हें जब गिरफ्तार किया गया तो उस समय वे यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज की एक अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी में शामिल होने के लिए बैंकाक जाने के लिए इम्फाल एयरपोर्ट पहुंचे थे। इसके अलावा वे एक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर राज्य में युवाओं में जागरूकता पैदा करने के लिए इम्फाल फ्री प्रेस, मणिपुर मेल, दि संघाई एक्सप्रेस से भी जुड़े रहे हैं। इसके अलावा इनकी राज्य में प्रस्तावित तिपाईमुख बांध सहित बांध से संबंधित कई महत्वपूर्ण रिपोर्टें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। खास बात यह है कि इनका कोई अपराधिक रिकार्ड भी नहीं है। गिरफ्तार अन्य सात लोगों की भी कोई अपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है। बल्कि वे तो राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने की मांग करते रहे हैं। कुल मिलकार कहा जा सकता है कि राज्य में सरकार द्वारा अलोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है और उनका विरोध करने वालों के लिए यह सबक है।

मणिपुर में मानवाधिकार हनन का सिलसिला काफी पुराना है। राज्य की एक महिला इरोम शर्मिला चानू राज्य में लोकतंत्र विरोधी कानून आफ्सपा के खिलाफ 4 नवंबर 2000 से आमरण अनशन पर है। उन्होंने अनशन का निर्णय तब लिया जब 2 नवंबर 2000 को असम राइफल्स के समूह पर कुछ अज्ञात लोगों द्वारा बम विस्फोट के बाद सेना की गोलीबारी से 10 लोगों की मौत हुई थी एवं सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 11 जुलाई 2004 को एक खास घटना हुई जब इम्फाल के पूर्व जिला बामोन की एक 32 वर्षीय महिला थंगजम मनोरमा को असम राइफल्स द्वारा रात को उनके घर से उठा लिया गया और तमाम तरह की यातनाओं के बाद उनकी लाश को घर से 5-6 किमी दूर स्थित राजमार्ग पर फेंक दिया गया था। जिसको लेकर मणिपुर में एक बडा़ विरोध प्रदर्शन हुआ था और महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर यह नारा दिया था कि ‘‘इंडियन आर्मी रेप अस’’। मणिपुर में इस कानून का विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध एवं तमाम आंदोलन के बाद नवंबर 2004 में गठित जीवन रेड्डी समिति ने अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दी है, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ है। राज्य में हर वर्ष सैकड़ों लोग सेना की गोलियों से मारे जा रहे हैं उसके बावजूद पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री श्री शिवराज पटिल मणिपुर में जाकर यह बयान देते हैं कि मरने वालों की संख्या इतनी नहीं है कि इस पर परेशान हुआ जाय।

इसके अलावा मनोरमा मामले को लेकर गठित की गयी सी. उपेन्द्र आयोग की रिपोर्ट दिसम्बर 2004 को आयी, पर अभी तक उसे गुप्त रखा गया है। इन स्थितियों के बीच वहां के स्कूलों की स्थिति ये है कि पूरे साल में औसतन 100 दिन या उससे कम ही चल पाते हैं, कारण वश वहां के छात्रों का लगातार पलायन जारी है और 20,000 से अधिक छात्र राज्य से बाहर जाकर पढ़ रहे हैं। स्कूली बच्चों ने राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली किताबों को राज्यपाल को वापस कर दिया है। इस तरह देखा जाय तो राज्य में अघोषित आपातकाल की स्थिति बनी हुई है।
हमेशा की तरह इस बार भी देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता चिल्ला रहे हैं कि गिरफ्तार युवकों की बिना शर्त रिहाई की जाए। राज्य में लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार दिया जाए और सरकारी हिंसा रोका जाए। 23 सितंबर को दिल्ली में मणिुपर भवन के सामने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं नागरिक समाज के लोगों ने प्रदर्शन भी किया। लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है भला? सरकार तो सोचती है कि लोग हल्ला करते रहें हम अपनी मनमरजी करते रहेंगे। इस संदर्भ में हमें अभी हाल ही के छत्तीसगढ़ के उदाहरण को नहीं भूलना चाहिए कि गत दो साल से जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को उच्च न्यायालय के आदेश के बाद रिहा करना पड़ा। इस मामले में राज्य सरकार की बहुत फजीहत हुई थी। यदि मणिपुर में तत्काल इन युवकों की रिहाई नहीं होती है तो भविष्य में मणिपुर सरकार को भी फजीहत झेलनी पड़ सकती है। लेकिन फिलहाल राज्य सरकार द्वारा युवकों के कैरियर से जो मजाक किया जा रहा है उसकी भरपायी तो मुश्किल ही होगी। इस तरह राज्य सरकार लोकतंत्र को तो ठेंगा ही दिखा रही है।




बाढ़ तो फिर भी आएगी

बाढ़ तो फिर भी आएगी
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

हमारे देश में खबरिया चैनलों को हमेशा ऐसे खबरों की तलाश रहती है जिसके लिए ज्यादा मेहनत न करनी पड़े, उन्हें दर्शक भरपूर मिले और वे संवेदनहीन न कहलाएं। चैनलों की ये इच्छा तो मानसून शुरू होते ही पूरी हो जाती है। इसमें खासा योगदान रहता है बिहार एवं उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों का। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस मुद्दे की बात कर रहा हूं? जी हां, मैं बाढ़ से जुड़े खबरों की ही बात कर रहा हूं। हर साल की तरह इस बार भी बिहार के कुछ इलाके में बाढ़ की विपदा आई हुई है। लेकिन इस बार बागमती और लखनदेई नदियों के तटबंध टूटने से बाढ़ आई है। बागमती नदी में सीतामढ़ी जिले के रूनीसैदपपुर ब्लाॅक के तिलक ताजपुर के पास 200 मीटर तटबंध टूटा है, जबकि बागमती की ही सहायक नदी लखनदेई में दो जगह दरार आई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार इस साल अब तक 75 गांवों के 3 लाख लोगों के घर बार डूब चुके हैं। लेकिन खबरिया चैनलों को मसाला मिल गया है।

इस साल भी प्रभावित लोगों के लिए राहत का दौर चलेगा, फिर आरोप प्रत्यारोप का दौर चलेगा, इसके बाद तटबंधों के मरम्मत में रकम खर्च किया जाएगा। यानी फिर से इंजिनियरों एवं ठेकेदारों की चांदी हो जाएगी। इस पूरी कवायद में जिन गरीबों के जान माल की क्षति हुई उनके लिए कोई स्थायी राहत की व्यवस्था तो फिलहाल हाल नहीं दिखती है। इस तरह पिछले पचास सालों से यह सिलसिला जारी है। बात बड़ी अजीब है कि नदियां तो सदियों से मौजूद हैं, बाढ़ भी सदियों से आती रही हैं तो फिर यह सिलसिला पचास साल से ही क्यों?

हां बात बिल्कुल सही है कि बिहार में पचास के दशक के पहले आने वाली बाढ़ों का स्वरूप ऐसा नहीं होता था। जब पहले बाढ़ आती थी तो स्थानीय लोग पहले से ही अपने घर बार छोड़कर सुरक्षित जगहों पर शरण ले लेते थे और पानी उतरते ही अपने स्थानों में वापस लौट जाते थे। वैसे भी पहले बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में लोग स्थाई निर्माण बहुत ही कम करते थे। लेकिन आजादी के बाद पूरे देश के लिए बाढ़ का स्थायी हल खोजने की कवायद शुरू हुई। भारत सरकार ने सन 1954 में पहली बाढ़ नियंत्रण नीति बनाई और उस समय देश भर में तमाम नदियों के किनारे कुल 33928.64 किमी लंबे तटबंध बनाने की योजना बनी। इसके पीछे लक्ष्य था देश भर के 2458 शहरों व कस्बों एवं 4716 गांवों को बाढ़ की तबाही से मुक्त करना। लेकिन हुआ क्या? सन 1954 में जहां पूरे देश में बाढ़ प्रवण इलाका 74.90 लाख हेक्टेअर था वहीं सन 2004 में बढ़कर करीब 22 गुना हो गया। जबकि नौंवी पंचवर्षीय योजना की समाप्ति तक (2002 तक) भारत सरकार इस कार्य के लिए 8113.11 करोड़ खर्च कर चुकी थी। बिहार में सन 1952 में राज्य में नदियों के किनारे बने तटबंधों की लंबाई 160 किमी थी तब उस समय बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेअर था। जबकि पचास साल बाद सन 2002 के आंकड़ों के अनुसार नदियों के किनारे बने तटबंधों की लम्बाई 3,430 किमी हो चुकी है लेकिन फिर भी बाढ़ प्रवण क्षेत्र बढ़कर 68.8 लाख हेक्टेअर हो गई है। तो क्या बाढ़ के लिए इंजिनियरिंग हल जायज माना जाय?

बिहार स्थित ‘बाढ़ मुक्ति अभियान’ के संयोजक डा. दिनेश कुमार मिश्र को बिहार के बाढ़ के मामले में सबसे बड़े विशेषज्ञों में गिना जाता है। उनका मानना है कि वास्तव में देखा जाय तो बाढ़ की ये व्यापकता इंजिनियरिंग हल के ही परिणाम हैं। अब सन 2008 का ही वाकया लेते हैं जब कोसी नदी का तटबंध टूटा था तो करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए थे। कोसी का तटबंध नेपाल में कुशहा के पास बीरपुर बराज से 12.9 किमी ऊपर टूटा था। कोसी का तटबंध अब तक कुल आठ बार टूटा है। मजेदार बात यह है कि उत्तरी बिहार में आने वाले बाढ़ के लिए नेपाल को जिम्मेदार ठहराया जाता है। क्या सच में ऐसा है? यह स्वाभाविक बात है कि उत्तरी बिहार में आने वाली नदियां जैसे गंडक, बुढ़ी गंडक, बागमती, आधवारा, धाउस, कमला, बलान, कोसी आदि सभी नेपाल से होकर ही आती हैं। जबकि नेपाल के पास ऐसा कोई भी ढांचा नहीं है जिससे कि नदियों को नियंत्रित किया जा सके। तो फिर नेपाल जिम्मेदार कैसे हुआ? जहां तक तटबंध टूटने की बात है वह नेपाल के इलाके में है लेकिन उस पर नियंत्रण तो भारत का ही है। नेपाल के 34 गांव कोसी बराज के नीचे हैं, लेकिन इसमें नेपाल का नियंत्रण कहीं नहीं है। बराज की पूरी प्रवाह क्षमता 9.5 लाख क्यूसेक है। 18 अगस्त 2008 को जब तटबंध में दरार पड़ी, उस समय पानी का प्रवाह 1.44 लाख क्यूसेक था, जबकि तटबंध और बराज की डिजाइन 9.5 लाख क्यूसेक क्षमता के अनुरूप बना है। इतने कम प्रवाह पर तटबंध का टूटना यह साबित करता है कि कोसी नदी की पेटी में गाद जमाव काफी ज्यादा है और तटबंध का रखरखाव बहुत बुरी अवस्था में है। तटबंध के दरार वाले हिस्से से बाहर जाने वाला पानी कोसी नदी में फिर से प्रवेश नहीं कर सका क्योंकि नदी पर दरार वाली जगह से 125 किमी आगे तक तटबंध बना हुआ है। इससे यह बात साबित होती है कि तटबंधों की वजह से नदी के स्वाभाविक जलग्रहण की प्रक्रिया बाधित होती है। बारिश का पानी भी तटबंध के बाहर जमा हो जाता है। इससे छोटी नदियों का संगम भी बाधित हो जाता है। स्लुइस गेट बनाकर इसके हल की कोशिश की गई, लेकिन वह भी सफल नहीं हो सका। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि मुख्य नदी में ज्यादा प्रवाह हो और सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में ज्यादा बारिश हो तो भी उसका पानी नदी में नहीं जा पाएगा। और फिर धीरे-धीरे नदी के पेटी में गाद भर जाता है और नदी का तल ऊपर उठ जाता है और तटबंध काम करना बंद कर देते हैं। इसके अलावा तटबंध की भी एक निर्धारित उम्र होती है। तटबंध बनने के बाद यदि उनके असर का मूल्यांकन करें तो सही स्थिति स्पष्ट हो जाती है।

कई बार कहा जाता है कि स्थानीय लोग ही तटबंध काट देते हैं। लेकिन यदि वे ऐसा करते हैं तो सच में वे अपनी जान माल बचाने के लिए करते हैं। अब तक न ऐसा कोई तटबंध बना है और न भविष्य में बनेगा जिसमें कटाव न आए। देश में विभिन्न नदी घाटी में बने तटबंधों को लोग समय-समय पर काटते रहते हैं। लेकिन ज्यादातर मौकों में छोटे तटबंध जलजमाव से निजात पाने के लिए ही तोड़े जाते हैं। इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थिति की मांग है कि गाद और पानी को प्राकृतिक रूप से फैलने देना चाहिए और स्थानीय स्तर पर उसका मुकाबला करना चाहिए। जिससे जमीन की ऊर्वरा शक्ति बढ़ेगी और भूजल का स्तर भी कायम रहेगा। साथ ही विभिन्न ढांचागत निर्माण के दौरान नदियों की प्राकृतिक ड्रेनेज को कायम रखना चाहिए। तब तो तटबंधों की कोई जरूरत नहीं दिखती। लेकिन सरकार तटबंधों को क्यों हटाना चाहेगी? यदि सरकार तटबंध तोड़ना चाहेगी तो टेंडर के माध्यम से करना होगा और उसके लिए काफी पैसा चाहिए। लेकिन इसके लिए सैद्धान्तिक मंजूरी भी जरूरी है। लेकिन जो भी हो इसमें ठेकेदारों को ही लाभ होगा, वह भी शायद एक बार ही! लेकिन यदि तटबंध कायम रहता है तो उसके मरम्मत और रखरखाव में तो हर साल लाखों करोड़ों का वारा न्यारा होता है। लेकिन इसी इंजिनियरिंग हल ने बिहार के जीवनदाई बाढ़ को आपदा का स्वरूप दे दिया है। इस तरह खबर तलाशने वालों को हर साल एक मसाला मिल जाता है।