Tuesday, December 22, 2009

लोकतंत्र को ठेंगा दिखाती मणिपुर सरकार

लोकतंत्र को ठेंगा दिखाती मणिपुर सरकार
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
देश की राजधानी या किसी अन्य बड़े शहर में रहते हुए बहुत सारे महत्वपूर्ण समाचारों पर कई बार हमारी नजर नहीं जा पाती है। इनमें से कई समाचार ऐसे होते हैं जो कि देश या किसी राज्य की पूरी व्यवस्था को झकझोरते हैं। ऐसी ही एक घटना हाल ही में हमारे पूर्वोत्तर में स्थित मणिपुर में घटित हुई है। हुआ यह कि गत 14 सितंबर को मणिपुर में आठ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार व्यक्तियों में एशिया पेसिफिक इंडिजिनियस यूथ नेटवर्क (एपीआईवाईएन) के समन्वय समिति के सदस्य जितेन युन्मन के अलावा आल मणिपुर यूनाइटेड क्लब आॅर्गनाइजेशन के सात सदस्य (एएमयूसीओ) सुंगचेन कोईरेंग, लिकमैबम टोंपोक, ए सोकेन, इराम ब्रोजन, टोआरेम रामदा, जी शरत काबुई एवं थियम दिनेश प्रमुख है।

अब सवाल उठता है कि इनलोगों ने क्या अपराध किया है? तो जवाब है कि अभी तो कोई अपराध नहीं किया है लेकिन फिर भी उन पर गंभीर आरोपों वाली धारायें लगायी गई हैं। इनमें आईपीसी की धारा ‘121/121 ए’, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा ‘16/18/39’ और सरकारी गोपनीयता अधिनियम की धाारा ‘ओ’ प्रमुख हैं। इसका मतलब है कि इन लोगों पर सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का प्रयास, सरकार के खिलाफ साजिश करने, गैरकानूनी गतिविधियों को मदद करने का आरोप है। अब यदि आरोप है तो इनके खिलाफ सबूत भी पेश किए जाने चाहिए, लेकिन इसके लिए राज्य सरकार बाध्य नहीं है। इसका मतलब है कि क्या हमारे देश में किसी को बगैर आरोप के लम्बे समय तक जेल में रखा जा सकता है तो, जवाब है कि हां ऐसा संभव है। हमारे देश में कुछ राष्ट्रीय तो कुछ राज्य स्तर के कानून ऐसे हैं जिनमें किसी आरोपी को दोष सिद्ध किए बगैर काफी समय तक जेल में रखा जा सकता है। इन कानूनों में मणिपुर सहित पूर्वोत्तर के कुछ अन्य राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफ्सपा) प्रमुख है। हालांकि इन गिरफ्तार कार्यकर्ताओं पर इस कानून की धाराएं तो नहीं लगायी गई हैं लेकिन भविष्य में इसकी संभावना जरूर है।

अब सवाल उठता है इन लोगों ने ऐसा क्या किया है जिससे सरकार को खतरा पैदा हो गया है। इसका जवाब इन लोगों की पृष्ठभूमि देखने से मिल जाता है। जितेन युन्मन एपीआईवाईएन के संस्थापक सदस्य होने के अलावा सिटीजेन कंसर्न आॅन डैम्स एंड डेवलेपमेंट (सीसीडीडी) के संयुक्त सचिव भी हैं। वे राज्य में विभिन्न मानवाधिकार मुद्दे पर काफी समय से कार्यरत है और राज्य के सैन्यीकरण के खिलाफ हैं। इन्होंने राज्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचने के नाम पर प्रस्तावित विभिन्न बड़े बांधो की सच्चाई को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सामने रखा है। इन्हें जब गिरफ्तार किया गया तो उस समय वे यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज की एक अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी में शामिल होने के लिए बैंकाक जाने के लिए इम्फाल एयरपोर्ट पहुंचे थे। इसके अलावा वे एक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर राज्य में युवाओं में जागरूकता पैदा करने के लिए इम्फाल फ्री प्रेस, मणिपुर मेल, दि संघाई एक्सप्रेस से भी जुड़े रहे हैं। इसके अलावा इनकी राज्य में प्रस्तावित तिपाईमुख बांध सहित बांध से संबंधित कई महत्वपूर्ण रिपोर्टें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। खास बात यह है कि इनका कोई अपराधिक रिकार्ड भी नहीं है। गिरफ्तार अन्य सात लोगों की भी कोई अपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है। बल्कि वे तो राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने की मांग करते रहे हैं। कुल मिलकार कहा जा सकता है कि राज्य में सरकार द्वारा अलोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है और उनका विरोध करने वालों के लिए यह सबक है।

मणिपुर में मानवाधिकार हनन का सिलसिला काफी पुराना है। राज्य की एक महिला इरोम शर्मिला चानू राज्य में लोकतंत्र विरोधी कानून आफ्सपा के खिलाफ 4 नवंबर 2000 से आमरण अनशन पर है। उन्होंने अनशन का निर्णय तब लिया जब 2 नवंबर 2000 को असम राइफल्स के समूह पर कुछ अज्ञात लोगों द्वारा बम विस्फोट के बाद सेना की गोलीबारी से 10 लोगों की मौत हुई थी एवं सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 11 जुलाई 2004 को एक खास घटना हुई जब इम्फाल के पूर्व जिला बामोन की एक 32 वर्षीय महिला थंगजम मनोरमा को असम राइफल्स द्वारा रात को उनके घर से उठा लिया गया और तमाम तरह की यातनाओं के बाद उनकी लाश को घर से 5-6 किमी दूर स्थित राजमार्ग पर फेंक दिया गया था। जिसको लेकर मणिपुर में एक बडा़ विरोध प्रदर्शन हुआ था और महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर यह नारा दिया था कि ‘‘इंडियन आर्मी रेप अस’’। मणिपुर में इस कानून का विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध एवं तमाम आंदोलन के बाद नवंबर 2004 में गठित जीवन रेड्डी समिति ने अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दी है, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ है। राज्य में हर वर्ष सैकड़ों लोग सेना की गोलियों से मारे जा रहे हैं उसके बावजूद पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री श्री शिवराज पटिल मणिपुर में जाकर यह बयान देते हैं कि मरने वालों की संख्या इतनी नहीं है कि इस पर परेशान हुआ जाय।

इसके अलावा मनोरमा मामले को लेकर गठित की गयी सी. उपेन्द्र आयोग की रिपोर्ट दिसम्बर 2004 को आयी, पर अभी तक उसे गुप्त रखा गया है। इन स्थितियों के बीच वहां के स्कूलों की स्थिति ये है कि पूरे साल में औसतन 100 दिन या उससे कम ही चल पाते हैं, कारण वश वहां के छात्रों का लगातार पलायन जारी है और 20,000 से अधिक छात्र राज्य से बाहर जाकर पढ़ रहे हैं। स्कूली बच्चों ने राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली किताबों को राज्यपाल को वापस कर दिया है। इस तरह देखा जाय तो राज्य में अघोषित आपातकाल की स्थिति बनी हुई है।
हमेशा की तरह इस बार भी देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता चिल्ला रहे हैं कि गिरफ्तार युवकों की बिना शर्त रिहाई की जाए। राज्य में लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार दिया जाए और सरकारी हिंसा रोका जाए। 23 सितंबर को दिल्ली में मणिुपर भवन के सामने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं नागरिक समाज के लोगों ने प्रदर्शन भी किया। लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है भला? सरकार तो सोचती है कि लोग हल्ला करते रहें हम अपनी मनमरजी करते रहेंगे। इस संदर्भ में हमें अभी हाल ही के छत्तीसगढ़ के उदाहरण को नहीं भूलना चाहिए कि गत दो साल से जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को उच्च न्यायालय के आदेश के बाद रिहा करना पड़ा। इस मामले में राज्य सरकार की बहुत फजीहत हुई थी। यदि मणिपुर में तत्काल इन युवकों की रिहाई नहीं होती है तो भविष्य में मणिपुर सरकार को भी फजीहत झेलनी पड़ सकती है। लेकिन फिलहाल राज्य सरकार द्वारा युवकों के कैरियर से जो मजाक किया जा रहा है उसकी भरपायी तो मुश्किल ही होगी। इस तरह राज्य सरकार लोकतंत्र को तो ठेंगा ही दिखा रही है।




बाढ़ तो फिर भी आएगी

बाढ़ तो फिर भी आएगी
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

हमारे देश में खबरिया चैनलों को हमेशा ऐसे खबरों की तलाश रहती है जिसके लिए ज्यादा मेहनत न करनी पड़े, उन्हें दर्शक भरपूर मिले और वे संवेदनहीन न कहलाएं। चैनलों की ये इच्छा तो मानसून शुरू होते ही पूरी हो जाती है। इसमें खासा योगदान रहता है बिहार एवं उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों का। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस मुद्दे की बात कर रहा हूं? जी हां, मैं बाढ़ से जुड़े खबरों की ही बात कर रहा हूं। हर साल की तरह इस बार भी बिहार के कुछ इलाके में बाढ़ की विपदा आई हुई है। लेकिन इस बार बागमती और लखनदेई नदियों के तटबंध टूटने से बाढ़ आई है। बागमती नदी में सीतामढ़ी जिले के रूनीसैदपपुर ब्लाॅक के तिलक ताजपुर के पास 200 मीटर तटबंध टूटा है, जबकि बागमती की ही सहायक नदी लखनदेई में दो जगह दरार आई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार इस साल अब तक 75 गांवों के 3 लाख लोगों के घर बार डूब चुके हैं। लेकिन खबरिया चैनलों को मसाला मिल गया है।

इस साल भी प्रभावित लोगों के लिए राहत का दौर चलेगा, फिर आरोप प्रत्यारोप का दौर चलेगा, इसके बाद तटबंधों के मरम्मत में रकम खर्च किया जाएगा। यानी फिर से इंजिनियरों एवं ठेकेदारों की चांदी हो जाएगी। इस पूरी कवायद में जिन गरीबों के जान माल की क्षति हुई उनके लिए कोई स्थायी राहत की व्यवस्था तो फिलहाल हाल नहीं दिखती है। इस तरह पिछले पचास सालों से यह सिलसिला जारी है। बात बड़ी अजीब है कि नदियां तो सदियों से मौजूद हैं, बाढ़ भी सदियों से आती रही हैं तो फिर यह सिलसिला पचास साल से ही क्यों?

हां बात बिल्कुल सही है कि बिहार में पचास के दशक के पहले आने वाली बाढ़ों का स्वरूप ऐसा नहीं होता था। जब पहले बाढ़ आती थी तो स्थानीय लोग पहले से ही अपने घर बार छोड़कर सुरक्षित जगहों पर शरण ले लेते थे और पानी उतरते ही अपने स्थानों में वापस लौट जाते थे। वैसे भी पहले बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में लोग स्थाई निर्माण बहुत ही कम करते थे। लेकिन आजादी के बाद पूरे देश के लिए बाढ़ का स्थायी हल खोजने की कवायद शुरू हुई। भारत सरकार ने सन 1954 में पहली बाढ़ नियंत्रण नीति बनाई और उस समय देश भर में तमाम नदियों के किनारे कुल 33928.64 किमी लंबे तटबंध बनाने की योजना बनी। इसके पीछे लक्ष्य था देश भर के 2458 शहरों व कस्बों एवं 4716 गांवों को बाढ़ की तबाही से मुक्त करना। लेकिन हुआ क्या? सन 1954 में जहां पूरे देश में बाढ़ प्रवण इलाका 74.90 लाख हेक्टेअर था वहीं सन 2004 में बढ़कर करीब 22 गुना हो गया। जबकि नौंवी पंचवर्षीय योजना की समाप्ति तक (2002 तक) भारत सरकार इस कार्य के लिए 8113.11 करोड़ खर्च कर चुकी थी। बिहार में सन 1952 में राज्य में नदियों के किनारे बने तटबंधों की लंबाई 160 किमी थी तब उस समय बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेअर था। जबकि पचास साल बाद सन 2002 के आंकड़ों के अनुसार नदियों के किनारे बने तटबंधों की लम्बाई 3,430 किमी हो चुकी है लेकिन फिर भी बाढ़ प्रवण क्षेत्र बढ़कर 68.8 लाख हेक्टेअर हो गई है। तो क्या बाढ़ के लिए इंजिनियरिंग हल जायज माना जाय?

बिहार स्थित ‘बाढ़ मुक्ति अभियान’ के संयोजक डा. दिनेश कुमार मिश्र को बिहार के बाढ़ के मामले में सबसे बड़े विशेषज्ञों में गिना जाता है। उनका मानना है कि वास्तव में देखा जाय तो बाढ़ की ये व्यापकता इंजिनियरिंग हल के ही परिणाम हैं। अब सन 2008 का ही वाकया लेते हैं जब कोसी नदी का तटबंध टूटा था तो करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए थे। कोसी का तटबंध नेपाल में कुशहा के पास बीरपुर बराज से 12.9 किमी ऊपर टूटा था। कोसी का तटबंध अब तक कुल आठ बार टूटा है। मजेदार बात यह है कि उत्तरी बिहार में आने वाले बाढ़ के लिए नेपाल को जिम्मेदार ठहराया जाता है। क्या सच में ऐसा है? यह स्वाभाविक बात है कि उत्तरी बिहार में आने वाली नदियां जैसे गंडक, बुढ़ी गंडक, बागमती, आधवारा, धाउस, कमला, बलान, कोसी आदि सभी नेपाल से होकर ही आती हैं। जबकि नेपाल के पास ऐसा कोई भी ढांचा नहीं है जिससे कि नदियों को नियंत्रित किया जा सके। तो फिर नेपाल जिम्मेदार कैसे हुआ? जहां तक तटबंध टूटने की बात है वह नेपाल के इलाके में है लेकिन उस पर नियंत्रण तो भारत का ही है। नेपाल के 34 गांव कोसी बराज के नीचे हैं, लेकिन इसमें नेपाल का नियंत्रण कहीं नहीं है। बराज की पूरी प्रवाह क्षमता 9.5 लाख क्यूसेक है। 18 अगस्त 2008 को जब तटबंध में दरार पड़ी, उस समय पानी का प्रवाह 1.44 लाख क्यूसेक था, जबकि तटबंध और बराज की डिजाइन 9.5 लाख क्यूसेक क्षमता के अनुरूप बना है। इतने कम प्रवाह पर तटबंध का टूटना यह साबित करता है कि कोसी नदी की पेटी में गाद जमाव काफी ज्यादा है और तटबंध का रखरखाव बहुत बुरी अवस्था में है। तटबंध के दरार वाले हिस्से से बाहर जाने वाला पानी कोसी नदी में फिर से प्रवेश नहीं कर सका क्योंकि नदी पर दरार वाली जगह से 125 किमी आगे तक तटबंध बना हुआ है। इससे यह बात साबित होती है कि तटबंधों की वजह से नदी के स्वाभाविक जलग्रहण की प्रक्रिया बाधित होती है। बारिश का पानी भी तटबंध के बाहर जमा हो जाता है। इससे छोटी नदियों का संगम भी बाधित हो जाता है। स्लुइस गेट बनाकर इसके हल की कोशिश की गई, लेकिन वह भी सफल नहीं हो सका। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि मुख्य नदी में ज्यादा प्रवाह हो और सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में ज्यादा बारिश हो तो भी उसका पानी नदी में नहीं जा पाएगा। और फिर धीरे-धीरे नदी के पेटी में गाद भर जाता है और नदी का तल ऊपर उठ जाता है और तटबंध काम करना बंद कर देते हैं। इसके अलावा तटबंध की भी एक निर्धारित उम्र होती है। तटबंध बनने के बाद यदि उनके असर का मूल्यांकन करें तो सही स्थिति स्पष्ट हो जाती है।

कई बार कहा जाता है कि स्थानीय लोग ही तटबंध काट देते हैं। लेकिन यदि वे ऐसा करते हैं तो सच में वे अपनी जान माल बचाने के लिए करते हैं। अब तक न ऐसा कोई तटबंध बना है और न भविष्य में बनेगा जिसमें कटाव न आए। देश में विभिन्न नदी घाटी में बने तटबंधों को लोग समय-समय पर काटते रहते हैं। लेकिन ज्यादातर मौकों में छोटे तटबंध जलजमाव से निजात पाने के लिए ही तोड़े जाते हैं। इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थिति की मांग है कि गाद और पानी को प्राकृतिक रूप से फैलने देना चाहिए और स्थानीय स्तर पर उसका मुकाबला करना चाहिए। जिससे जमीन की ऊर्वरा शक्ति बढ़ेगी और भूजल का स्तर भी कायम रहेगा। साथ ही विभिन्न ढांचागत निर्माण के दौरान नदियों की प्राकृतिक ड्रेनेज को कायम रखना चाहिए। तब तो तटबंधों की कोई जरूरत नहीं दिखती। लेकिन सरकार तटबंधों को क्यों हटाना चाहेगी? यदि सरकार तटबंध तोड़ना चाहेगी तो टेंडर के माध्यम से करना होगा और उसके लिए काफी पैसा चाहिए। लेकिन इसके लिए सैद्धान्तिक मंजूरी भी जरूरी है। लेकिन जो भी हो इसमें ठेकेदारों को ही लाभ होगा, वह भी शायद एक बार ही! लेकिन यदि तटबंध कायम रहता है तो उसके मरम्मत और रखरखाव में तो हर साल लाखों करोड़ों का वारा न्यारा होता है। लेकिन इसी इंजिनियरिंग हल ने बिहार के जीवनदाई बाढ़ को आपदा का स्वरूप दे दिया है। इस तरह खबर तलाशने वालों को हर साल एक मसाला मिल जाता है।


बाघ जीता और मनुष्य हारा!

बाघ जीता और मनुष्य हारा!

  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

आपसे एक सवाल पूछा जाय कि यदि एक मनुष्य और एक बाघ दोनों पानी में डूब रहे हैं तो आप किसे बचाना चाहेंगे। शायद स्वाभाविक रूप से आप कहेंगे कि मनुष्य को बचाना चाहेंगे। लेकिन सवाल है कि बाघ हमारे देश के जंगलों से विलुप्त हो रहे हैं तो शायद आप बाघ के प्रति सहानुभूति रखेंगे। चलिए इस सवाल को जरा विस्तार से देखते हैं। यदि आपसे कहा जाय कि किसी परियोजना से करीब 1 लाख लोग विस्थापित होंगे और यही कोई 2 या 3 बाघ विस्थापित होंगे तो आपकी सहानुभूति किसके प्रति होगी। शायद विस्थापन की आर्थिक और समाजिक लागत के आधार पर देखें तो स्वाभाविक तौर पर आप मनुष्यों के पक्ष में सोचेंगे। हां, यह भी ध्यान रखें कि जब किसी परियोजना से लोग विस्थापित होते हैं तो उनके साथ उनके पालतू पशु भी काफी संख्या में विस्थापित होते हैं। लेकिन हमारे देश के मंत्रीगण आपसे कुछ अलग राय रखते हैं, जहां मनुष्यों के मुकाबले बाघ को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।

जी हां, भारत की बहुचर्चित नदीजोड़ परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित केन बेतवा परियोजना के मामले में मनुष्यों के मुकाबले बाघ को ज्यादा तरजीह मिली है। ऐसा हमारे देश के केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री श्री जयराम रमेश कह रहे हैं। अभी हाल ही में उन्होंने कहा है कि, ‘‘मुझे यह जानकर धक्का लगा कि अभी तक जिस एकमात्र नदीजोड़ परियोजना ‘केन-बेतवा’ पर काम आगे बढ़ा है, उसमें पन्न्ना बाघ अभयारण्य भी शामिल है।’’ इस नदीजोड़ परियोजना से पन्ना बाघ अभयारण्य का कम से कम 140 हेक्टेयर क्षेत्र पानी में डूब जाने की आशंका है। वन्यजीव विशेषज्ञ पी. के. सेन का कहना है कि, ‘‘पन्ना वन्यजीव अभयारण्य की भूमि के कुछ हिस्सों को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव पर्यावरण मंत्रालय के समाने रखा जाना है, लेकिन वन्यजीवों के आवास के खतरे को देखते हुए इस पर किसी कीमत पर सहमति नहीं दी जानी चाहिए।’’ मध्य प्रदेश का पन्ना राष्ट्रीय अभयारण्य 974 वर्ग किमी. में फैला हुआ है और भारत का जाना माना अभयारण्य है। अब यह समाचार अधिकारिक है कि पन्ना राष्ट्रीय अभयारण्य में बाघ नहीं बचे हैं, जहां करीब 6 साल पहले 40 से ज्यादा बाघ थे। पन्ना में बाघ न होने की पुष्टि मध्य प्रदेश के वन मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने कुछ माह पहले अधिकारिक रिपोर्ट में की थी। इससे पहले प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व प्रमुख पी. के. सेन के नेतृत्व में विशेष जांच दल ने पन्ना राष्ट्रीय उद्यान जाकर मामले की जांच की और दावा किया है कि पन्ना में एक भी बाघ नहीं बचे हैं। दल ने जून 2009 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। अब वन विभाग ने पन्ना अभयारण्य में मादा बाघ लाकर फिर से बाघ युक्त करने की कवायद शुरू की है। अभयारण्य में अब मात्र दो बाघिने हैं जो कि कान्हा राष्ट्रीय उद्यान एवं बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान से लाई गई हैं। अब इस अभयारण्य के अस्तित्व पर नदीजोड़ परियोजना का खतरा मंडरा रहा है।

मध्य प्रदेश में केन-बेतवा नदीजोड़ परियोजना के कारण लगभग 8,650 हेक्टेयर भूमि डूबने की आशंका है, जिसमें लगभग 6,400 हेक्टेयर वन भूमि और शेष 2,171 हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। इसमें कुछ भूमि पन्ना अभयारण्य की है। गौरतलब है कि ये डूब तो सिर्फ परियोजना के लिए प्रस्तावित मुख्य बांध से संभावित है। जबकि पूरी परियोजना के तहत 231 किमी लम्बी सम्पर्क नहर के अलावा 6 अन्य बड़े बांध भी बनाए जाने हैं। ये 6 बांध इसलिए प्रस्तावित हैं क्योंकि केन-बेतवा नदीजोड़ परियोजना से जो मौजूदा सिंचित क्षेत्र प्रभावित होंगे उनकी भरपायी की जा सके। लेकिन मजेदार बात यह है कि राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) द्वारा प्रकाशित संभाव्यता रिपोर्ट में इन सहायक बांधो के बारे में विस्तार से जिक्र नहीं है, इसलिए इनसे प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का भी ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। हालांकि इन सबकी विस्तृत जानकारी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में होनी चाहिए। सूत्रों के अनुसार 15 करोड़ रुपये की व्यय वाली डीपीआर एनडब्ल्यूडीए द्वारा तैयार करके 31 दिसम्बर 2008 को केन्द्र सरकार को सौंप दी गई है। चूंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी है इसलिए इसे संबंधित विभागों के सामने नहीं पेश किया गया है।

अगस्त 2005 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव एवं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल गौर ने प्रधामंत्री डा. मनमोहन सिंह को डीपीआर बनाने के लिए सहमति पत्र सौंपा था। उस समय चैतरफा हल्ला ऐसे मचा कि दोनों राज्यों के बीच परियोजना बनाने के लिए सहमति हो गई। माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश को प्रस्तावित परियोजना में कई आपत्तियां हैं। इसके अलावा यह भी स्पष्ट है कि परियोजना से मध्य प्रदेश के क्षेत्रों को ज्यादा फायदा होगा जबकि उत्तर प्रदेश का ज्यादा इलाका प्रभावित होगा। परियोजना के क्रियान्वयन के लिए केन्द्र सरकार ने एक बोर्ड के गठन का सुझाव दिया है, जिसमें केन्द्र के सदस्यों सहित मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश सरकार के सदस्य शामिल रहेंगे।

नदीजोड़ योजना के कार्यदल के स्रोत के अनुसार परियोजना के लिए मध्य प्रदेश में छतरपुर एवं पन्ना जिले की सीमा पर केन नदी पर डौढन में 73.2 मीटर ऊंचा मुुख्य बांध प्रस्तावित है। इस डौढन जलाशय से 10,200 लाख घनमी. पानी नहर में मोड़ा जाना है। सम्पर्क नहर की कुल लम्बाई 231 किमी होगी, जिसमें 2 किमी सुरंग शामिल है। सम्पर्क नहर के मार्ग में पड़ने वाले 6.45 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए 31,960 लाख घनमी. पानी इस्तेमाल होगा। इसमें 1.55 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में एवं 4.90 लाख हेक्टेयर मध्य प्रदेश में सिंचित होना प्रस्तावित है। इस नहर से 120 लाख घनमी. पानी घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए दिया जाएगा। नहर के मार्ग में रिसाव से 370 लाख घनमी. पानी का क्षति होगा।

इस परियोजना के सम्बंध में एक और विवादास्पद बात यह है कि इसकी संभाव्यता ही स्थापित नहीं हो सकी है। इस तरह जब किसी परियोजना की संभाव्यता स्थापित न हो तो उसके आधार पर बनने वाले डीपीआर की क्या प्रासंगिकता रहेगी? देश भर में कई प्रमुख विशेषज्ञों के अलावा दिल्ली स्थित संस्था सैण्ड्रप ने एक अध्ययन में परियोजना के संभाव्यता रिपोर्ट (फिजिबिलिटी रिपोर्ट) पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सैण्ड्रप के समन्वयक हिमांशु ठक्कर का मानना है कि केन-बेतवा परियोजना के लिए किया गया जल संतुलन आकलन ही गलत है, इसके अलावा प्रस्तावित सिंचाई लाभ का वितरण भी असमानतापूर्ण है। जबकि पन्ना बाघ अभयारण्य का जो मामला केन्द्रीय मंत्री अब उठा रहे हैं उसके बारे में 5 साल पहले ही अध्ययन के माध्यम से अगाह किया गया था।

आखिर जो भी हो लेकिन अब सच खुलकर सामने आ रहा है। यह बात समझ से परे है कि जिस परियोजना में स्थानीय स्तर पर काफी विरोध एवं उत्तर प्रदेश सरकार की आपत्ति है उस पर आगे बढ़ते रहने का क्या औचित्य है? एक अनुमान के अनुसार बांध के डूब क्षेत्र में करीब 65,000 से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे, जबकि अन्य सहायक बांधों एवं सम्पर्क नहर से प्रभावित होने वाले लोगों को जोड़ा जाय तो विस्थापितों संख्या काफी ज्यादा होगी। अब हमारे पर्यावरण मंत्री के संवेदनशीलता के बारे में क्या कहा जा सकता है कि उन्हें कुछ वन्यजीवों एवं उनके 140 हेक्टेयर क्षेत्र के डूब का संकट तो दिखता है लेकिन हजारो प्रभावित होने वाले लोगों एवं करीब 10,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन डूब का दर्द नहीं दिखता। शायद इसमें उनकी कोई गलती नहीं है, क्योंकि वे तो अपने विभाग से संबंधित बातों की ही चिंता करेंगे! तो फिर उन हजारों लोगों की चिंता कौन करेगा जो कि एक विवादास्पद परियोजना से विस्थापित होने वाले हैं?

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, 21 दिसम्बर 2009)


छात्र राजनीति की प्रासंगिकता


छात्र राजनीति की प्रासंगिकता
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

देश की राजधानी में स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय में हर साल की ही तरह इस साल भी छात्र संघ के चुनाव हुए। इस बार विश्वविद्यालय चुनाव में काफी उथल पुथल देखने को मिला। हमेशा से विश्वविद्यालय के छात्र संघ पर कब्जा जमाने वाले मुख्य धारा के दो छात्र संगठनों के प्रमुख प्रत्याशियों का नामांकन ही खारिज कर दिया गया। ऐसे में भारत में छात्र राजनीति पर एक नजर डालने की कोशिश करते हैं।
क्या दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ कोे छात्र राजनीति का स्वस्थ चेहरा कहा जा सकता है? कहने के लिए तो भारत के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में सबसे ज्यादा छात्र इस विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं। लेकिन विश्वविद्यालय के हरेक छात्र को मताधिकार हासिल नहीं है क्योंकि विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कई काॅलेजों ने खुद को इस प्रक्रिया से अलग किया हुआ है। ऐसा इसलिए कि उन काॅलेजों का प्रबंधन छात्र राजनीति को नकारात्मक मानता है। विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में नामाकित छात्रो में से सिर्फ 24 प्रतिशत ही मतदान कर सकते है। इस तरह यहां के प्रतिनिधियों को पूरे विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। इसके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र संघ चुनाव किसी शिक्षण संस्थान के प्रतिनिधियों का चुनाव के बजाय किसी बड़ी राजनीति के लिए शक्ति प्रदर्शन का एक माध्यम दिखता है। तभी तो सन 2008 में हुए चुनाव में लिंगदोह कमेटी के सिफारिशों को मानने के बावजूद उसकी धज्जियां उड़ाते हुए धन-बल का खुला प्रदर्शन किया गया। आखिर ऐसा क्यों न हो जब इन चुनावों को क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक सीढ़ी के रूप में देखा जाता है। इस तरह राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर के राजनैतिक दलों को ऐसे पिछलग्गू कार्यकर्ता मिल जाते हैं जो कि भविष्य में सक्रिय राजनीति की आस लगाए रहते हैं। उन पिछलग्गूओं में से कुछ का कल्याण भी हो जाता है यदि वे किसी नेता के वारिस होते हैं। लेकिन इस बार चुनाव अधिकारी का डंडा चला और एनएसयूआई और एबीवीपी के तीन-तीन प्रत्याशियों का नामांकन खारिज कर दिया गया। इस तरह छात्र राजनीति में धन बल के इस्तेमाल को रोकने की एक कोशिश तो हुई ही। लेकिन कुल मिलाकर देखा जाय तो पिछले 10 सालों में एक भी ऐसा मौका नहीं आया जब यहां के छात्र नेताओं ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी हो या आंदोलन की आगुवाई की हो।

भारत के सबसे बड़े आवासीय केन्द्रीय विश्वविद्यालय ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ (बीएचयू) में पिछले पिछले तेरह सालों से छात्र संघ स्थगित है। वहां का प्रशासन छात्र संघ को विश्वविद्यालय के हित में नहीं मानता। इन सालों में बीएचयू में जिस किसी ने भी छात्र संघ की आवाज उठाई उन्हें विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब तो हाल के सालों में विश्वविद्यालय में ऐसी पीढ़ी आ चुकी है जिन्हें छात्र राजनीति से कोई मतलब ही नहीं है। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन का मनमानापन जारी है। लेकिन यदि बीएचयू के छात्र संघ का इतिहास बताता है कि विश्वविद्यालय ने कई ऐसे नेताओं को पैदा किया है जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया है।

अब दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को ही लें, वहां पर लिंगदोह कमेटी के सिफारिशों को न मानने के कारण सन 2008 में छात्र संघ चुनाव स्थगित हो चुका है। मोटे तौर पर जेएनयू छात्र संघ में धन बल का बोलबाला नहीं दिखता है। इतना ही नहीं वहां के छात्र संघ को आदर्श माना जाता रहा है। जेएनएयू का छात्र समुदाय हमेशा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखता रहा है। इसी वजह से वहां पर सभी सामयिक व ज्वलंत मुद्दों पर स्वस्थ चर्चा होती रहती है। इसके बावजूद भी प्रशासन को छात्र संघ हमेशा खटकता रहा है। अभी दो साल पहले ही जेएनयू में छात्रों ने वहाँ पर काम करने वाले निर्माण मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तथा अन्य सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। तब विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि यह छात्रों का काम नहीं है और उन्हें इससे दूर रहना चाहिए। लेकिन छात्रों ने अपना आंदोलन जारी रखा तो प्रशासन 8 छात्रों का निष्कासन कर दिया।
इसके अलावा भारत के आईआईटी सहित ज्यादातर तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में छात्र संघ मौजूद ही नहीं है। अब तो पिछले कुछ सालों से निजी शिक्षण संस्थान एवं विश्वविद्यालय काफी तेजी से खुले हैं, वहां भी छात्र संघ का कोई नामलेवा नहीं है। जिस प्रकार पिछले सालो में उत्तर प्रदेश सहित भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों और कालेजों में छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है यदि उसी सोच पर चला जाए तब हमें अपने सारे लोकतांत्रिक अधिकारों को छोड़ना पड़ेगा जिसे हमने लम्बे संघर्ष के बाद हासिल किया है। छात्र संघ न गठित करने के पीछे छात्रों में अपराधीकरण का बहाना बनाया जाता है। हालांकि छात्र राजनीति का अपराधीकरण कोई नई घटना नहीं है। जब पूरी भारतीय राजनीति में धन-बल का बोलबाला हो तब छात्र राजनीति अपराधीकरण से कैसे अछूती रह सकती है। तब क्या पूरे भारत में चुनावी प्रक्रिया को बंद कर दिया जाए।

क्या जिन काॅलेजों या विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव नहीं होते हैं वहां पर हर साल आने वाले नये छात्रों से इस बारे में राय ली जाती है? शायद नहीं! उन शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मन में छात्र संघ के प्रति नकारात्मक भावना भरी जाती है। एक तरफ तो विश्वविद्यालयों को देश के भावी नागरिकों के निर्माण की पाठशाला कहा जाएगा वहीं दूसरी ओर आप यह भी सिखाएंगे कि केवल अपने बारे मंें सोचो, अपने आस-पास की हकीकत से आँखें मूंदे रहो। जो अपने आस-पास हो रहे शोषण और अन्याय से कोई सरोकार नहीं रखते वे अपनी भाषा में ‘‘समझदार’’ तो हो सकते हैं लेकिन एक बेहतर नागरिक कभी नहीं हो सकते।

आजकल गैर-राजनीतिक होना बहुत अच्छी बात मानी जाती है लेकिन हम अपने जीवन में क्या पढ़ेंगे, क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, किस प्रकार का रोजगार पाएंगे आदि बातें राजनीति से तय होती हैं। मसलन काॅलेजों में लड़कियों के पहनावे पर फरमान जारी किए जाएंगे, युवाओं द्वारा प्यार करने तथा दूसरे धर्म या जाति में जीवन साथी चुनने पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाएगा, जाति पंचायत बुलाकर सजा सुनाई जाएगी। यह उन लोगों और संगठनों की राजनीति है जो महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहते हैं, धार्मिक जकड़न तथा ऊंच-नीच पर टिकी जाति व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। इस प्रकार वे प्रत्येक युवा को भारतीय संविधान में मिली निजी स्वतंत्रता व सम्मान के अधिकार पर हमला करते हैं। लेकिन इसके बावजूद क्या छात्र गैर-राजनीतिक बने रहेंगें?

बीते दो दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में भी निजीकरण व व्यवसायीकरण का बोलबाला हो गया है। यदि आपके पास पैसा है तो हर प्रकार की डिग्रियां मिल सकती हैं, यदि पैसे नहीं हैं तो बैंक से कर्ज की व्यवस्था है। यानी कि शिक्षा के इन दुकानदारों का मुनाफा जारी रहेगा। अब तो शिक्षा को घोषित रूप से मुनाफे का धंधा मान लिया गया है। उद्योगपतियों की ओर से सरकार को सौंपी गई बिरला-अम्बानी रिपोर्ट इसका नायाब उदाहरण है। सरकार इनको मुफ्त जमीन उपलब्ध कराती है, सुविधाएं देती है और ये लोगों की जेबों से लाखों की उगाही करते हैं। क्या शिक्षा अमीरों के लिए पैसे कमाने का व्यवसाय बनी रहेगी या यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वो सबको निःशुल्क एक समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराए। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान सरकार ने चुप्पे से देश के निजी विश्वविद्यालयों को अपने नाम के साथ ‘डीम्ड’ शब्द लगाने की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी है। इस तरह हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा घोषित ‘सबको शिक्षा का अधिकार’ सिर्फ दिखावा नजर आता है। अगर छात्र ये सब सवाल खड़े करने लगंे तो यह राजनीति हो जाएगी। यदि सही प्रश्न खड़ा करना राजनीति है तो यह राजनीति की जानी चाहिए।

छात्रों ने हमेशा समाज परिवर्तन में अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभायी है। चाहे वो आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद 70 के दशक में में नक्सलबाड़ी और जेपी आंदोलन हो। आजकल कभी-कभार छात्रों की किसी स्थानीय मांग के लिए छोटी-मोटी आवाज उठती है लेकिन कोई संगठित प्रतिरोध नहीं दिखता है। छात्र राजनीति के नाम पर एबीवीपी, एनएसयूआई सहित कुछ राष्ट्रीय राजनति से जुड़े दलों के छात्र संगठन जैसे व्यवस्था पोषक छात्र संगठन ही दिखायी पड़ते हैं। इन संगठनों ने ही छात्र राजनीति को पैसे और गुण्डों का पर्याय बना दिया है। बल्कि जब छात्र अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और सक्रिय हस्तक्षेप करेंगे तब छात्र राजनीति पैसे और गुण्डों का नहीं सामाजिक परिवर्तन का पर्याय बनेगी। इसके लिए जरूरी है कि देश के हरेक उच्च शिक्षण संस्थान में राजनैतिक बहस जारी रहे और स्वस्थ छात्र संघ कायम रहे।




भारत में बढ़ते पर्यटन से उभरते सवाल

भारत में बढ़ते पर्यटन से उभरते सवाल

  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

अभी हाल ही में एक खबर पढ़ने को मिली कि ‘‘भारत में पर्यटन का भविष्य उज्जवल’’ है। खबर का लबो लुआब यह है कि पिछले सालों के मुकाबले इस साल पर्यटन द्वारा विदेशी मुद्रा आय में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है और यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रहने की संभावना है। दुनिया भर में जहां में मंदी का साया है वहीं पर्यटन की संभावना काफी उम्मीद जगाने वाली है। लेकिन कुछ ही दिनों पहले केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक अश्विनी कुमार ने राजधानी दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान जानकारी दी थी कि भारत में यौन पर्यटन एवं मानव तस्करी की प्रवृत्ति हाल के दिनों में काफी बढ़ी है। क्या दोनों खबरों में कोई आपसी रिश्ता है? ऐसे सवालों का जवाब खोजना बहुत जरूरी हैं।

चलिए सीबीआई के खुलासे को ही आगे बढ़ाते हैं। यह तो सभी जानते हैं कि सीबीआई भाारत सरकार की एक अधिकारिक जांच एजेंसी है और इनके आंकड़े भी अधिकारिक माने जाते हैं। सीबीआई के अनुसार नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी के बाद अपराधों की दुनिया में तीसरा स्थान मानव तस्करी का है। एशिया और विशेषकर भारत इस घिनौने अपराध के अड्डे के रूप में उभर रहा है। एक अनुमान के अनुसार सिर्फ नेपाल एवं बांग्लादेश से ही हरेक साल करीब 25,000 महिलाओं व बच्चों की तस्करी की जाती है। बच्चों को तस्करी के माध्यम से ले जाकर उन्हें भीषण यातनाएं देना, उन पर अत्याचार और बलात्कार जैसे अपराध किए जाते हैं। इसके अलावा गृह मंत्रालय के अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार सन 2007 में मानव तस्करी के सबसे ज्यादा 1,199 मामले तमिलनाडु में दर्ज हुए थे, जबकि पूरे देश में 3,568 केस दर्ज किए गए थे। सीबीआई का कहना है कि दुनिया भर में हर साल करीब 60 से 80 लाख लोगों की तस्करी होती है और इस कारोबार में करीब 5 से 9 अरब डाॅलर के वारे न्यारे होते हैं। पीड़ीतों में लगभग 80 प्रतिशत महिलाएं एवं बच्चियां होती हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत अवयस्क होते हैं।

हालांकि इस बात के स्पष्ट आंकड़े मौजूद नहीं है कि इन मानव तस्करियों में से कितने प्रतिशत का पर्यटकों के मौज मस्ती लिए इस्तेमाल होता है। चूंकि भारत में यह कार्य गैरकानूनी है इसलिए इसके सही आंकड़े कभी भी हासिल नहीं हो सकते हैं लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं कि पर्यटन स्थलों के आस पास यौन पेशा काफी फल फूल रहा है। दुनिया भर में पर्यटन के कई स्वरूप मौजूद हैं जिनमें एतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, एडवेंचर, इको पर्यटन आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा हाल के सालों में उन्नत चिकित्सा सुविधा वाले देशो में मेडिकल पर्यटन का भी प्रचलन बढ़ा है। स्वाभाविक तौर पर भारत में उपरोक्त सभी किस्म के पर्यटन मौजूद हैं लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सरकार किस किस्म के पर्यटन को बढ़ावा देना चाहती है? पर्यटन मुद्दे पर कार्यरत बंगलौर स्थित संस्था ‘‘इक्वेशंस’’ के मुताबिक सरकार की मौजूदा नीति इको पर्यटन को बढ़ावा देने की है और इसके लिए सबसे चहेता स्थल है भारत का ‘‘पूर्वोत्तर क्षेत्र’’। इस क्षेत्र को ‘‘अनछुआ स्वर्ग’’ कहकर प्रचारित किया जा रहा है। इसके लिए भारत के पूर्वोत्तर राज्यों सहित दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के प्रमुख पर्यटन क्षेत्रों को एक पैकेज के तौर पर विकसित करने और मुख्य रूप से इकोटूरिज्म और बौद्ध सर्किट विकसित करने की योजना है। इसके लिए एशियाई विकास बैंक कर्ज देने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत भी है। लेकिन क्या यह जरूरी नहीं है कि यह सब जहां किया जाना वहां के लोगों से कुछ राय ली जाय। शायद हमारी सरकार ऐसा जरूरी नहीं समझती।

जो लोग भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की स्थिति से वाकिफ हैं वे इसकी तुलना थाइलैंड में 70 और 80 के दशक में विकसित हुए पर्यटन से कर सकते हैं। यह जगजाहिर है कि पर्यटन के नाम पर वहां सेक्स पर्यटन काफी फला फूला। उससे थाई समाज पर काफी नकारात्मक असर भी पड़ा। यहां तक कि थाइलैंड में बदनाम मनोरंजन स्थलों का समाप्त करने के थाइलैंड सरकार के प्रयासों पर सवाल उठाते हुए, ‘टाइम पत्रिका’ ने अपने एक लेख में अनुमान लगाया है कि बैंकाॅक बहुत जल्द ही सेक्स पर्यटकों का स्वर्ग बन जाएगा। इसके जवाब में प्रधानमंत्री थैकसिन हैर्सली ने टाइम पत्रिका की आलोचना करते हुए लोगों से आग्रह किया कि जो लेख थाइलैंड के लिए ‘‘रचनात्मक’’ नहीं हैं उस पत्रिका को न पढ़ें। लेकिन क्या इससे सच छुप सकता है? क्या पूर्वोत्तर क्षेत्र में ऐसी आशंका नहीं है? ऐसी आशंका सिर्फ हमारी नहीं है बल्कि पूर्वोत्तर के लोगों की भी है। सितंबर 2007 में दिल्ली में विश्व बैंक पर इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्राइब्यूनल आयोजित हुई थी उस समय नागालैंड निवासी एवं नेशनल कांउंसिल आफ चर्चेज आॅफ इंडिया के कार्यकारी सचिव रेव. अवला लौंगकुमेर ने थाइलैंड से लौटकर अपने अनुभवों के आधार पर क्षेत्र के बारे में आशंका व्यक्त की। उनका कहना था कि, ‘‘मैं सिर्फ उम्मीद कर सकता हूं कि पूर्वोत्तर के लोगों को वैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा जैसा उत्तरी थाइलैंड के लोग कर रहे हैं। पर्यटन से उत्तरी थाइलैंड के लोगों को जो अपार क्षति हुई है उसे बताना सिहरन पैदा करने वाला है। सब कुछ और हर कोई एक वस्तु में तब्दील हो गया है। एक बालिका या एक महिला का मूल्य शून्य है। संस्कृति खरीददारी के लिए एक वस्तु रह गयी है जिसका मूल्य भी खरीददार ही निर्धारित करता है। एकदम असमान माहौल में पर्यटक हमेशा विजयी रहता है। मेजबान की स्थिति कमजोर हो जाती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किस प्रकार नव उदारवादी अर्थव्यवस्थाओं ने थाइलैंड को प्रभावित किया और एक मजबूत अर्थव्यवस्था तैयार की लेकिन आम लोगों को सिसकने के लिए छोड़ दिया। वह विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष था जिन्होंने उनका विनाश कर दिया।’’

क्या हमारी सरकार ऐसी स्थिति के लिए सजग है? कम से कम सरकार को इतना तो करना चाहिए कि हरेक क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थिति का अकलन किए बगैर इको टूरिज्म को मनमाने ढंग से बढ़ावा न दिया जाय। हाल ही में विश्व बैंक और एडीबी ने फिर से पर्यटन में दिलचस्पी लेनी शुरू की है और उनकी योजना फिर से ठीक उन्हीं बातों में वित्तपोषण शुरू करने की है जो हमारे लोगों, संस्कृति, हमारी पारिस्थितिकी, युवा और महिलाओं के लिए काफी घातक साबित हो सकते हैं। सवाल है कि क्या हमें पर्यटन की कोई आवश्यकता है? हां, यदि स्थानीय लोगों की सहमति हो तभी। किसी भी प्रकार की पर्यटन गतिविधि वाशिंगटन या नयी दिल्ली केंद्रित व्यवस्था की नीतियों और रणनीति पर आधारित नहीं हो सकती। उन्हें साफ तरह से एवं बिना किसी समझौता के लोकतांत्रिक तरीके से तैयार एवं कार्यान्वयन किया जाना चाहिए।

पर्यटन को ‘‘आनंद एवं छुट्टी‘‘ के रूप में प्रमुखता से परिभाषित किया जाता है तो हमारे मन में एक भय पैदा होता है कि पर्यटन के साथ यौन पर्यटन, बाल दुव्र्यवहार, बाल यौनशोषण तथा बुराइयां भी साथ आएंगी। हमारे पहाड़ी क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं और वे हमारी जैव विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन इलाकों को अनिवार्य रूप से संरक्षित क्षेत्र रहने देना चाहिए तथा इन्हें अनियंत्रित पर्यटन के लिए नहीं खोला जाना चाहिए। मैं चेतावनी की घंटी बजाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। यह कहना भ्रम है कि पर्यटन से स्थानीय समुदाय को फायदा होता है। वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। पर्यटन समीकरण में असली लूटने वालो में पर्यटकों के अलावा भेजने वाले देश, बहुराष्ट्रीय कंपनियां एवं बड़े व्यवसायी होते हैं जो धनी देशों से पर्यटक भेजते हैं।