Tuesday, December 22, 2009
जलवायु सुधार या कुछ और?
जलवायु सुधार या कुछ और?
- बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
9 जुलाई को इटली के ला‘अकीला शहर में चल रहे जी-8 देशों के सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन एक व्यापक समझौते को मंजूरी दी गई। समझौते के तहत विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन 2050 तक आधा करने को लेकर किसी तरह की पाबंदी शामिल नहीं है। सम्मेलन में उपस्थित जी-5 के अन्य सदस्य देशों के लिए इसे एक उपलब्धि बताई जा रही है। लेकिन क्या वाकई यह खुश होने वाली बात है? आइए इस पर गौर करते हैं।
वास्तव में देखा जाय तो इटली में चल रहे सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है लेकिन केन्द्रीय मुद्दा तो नहीं है। तो फिर यह महत्वपूर्ण समझौता क्यों हुआ? इसके पीछे की खास बात यह है कि सम्मेलन की शुरूआत में ही जी-5 देशों के सदस्यों ने मांग की थी कि विकसित देशों को 2020 तक अपना उत्सर्जन लक्ष्य 40 प्रतिशत तक घटाना होगा। साथ ही वर्ष 2025 तक इसे 80 से 85 प्रतिशत तक घटाने की प्रतिबद्धता दिखानी होगी। यह कोई नई मांग नहीं थी बल्कि यह तो ‘‘यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस’’ एवं उसके क्योटो प्रोटोकाल के तहत यह विकसित देशों की जिम्मेदारी है। इसके तहत विकसित देशों को 1990 के उत्सर्जन स्तर को 2020 तक कायम करना होगा। लेकिन विकसित औद्योगिक लाभ हासिल करने की हेकड़ी में इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन अब वैश्विक मंदी के दौर में विकासशील देशों की मांग को इनकार कर पाना उतना आसान नहीं रहा। वास्तव में जी-5 देशों के इस मांग की नींव 2007 दिसंबर में ही पड़ गई थी जब इंडोनेशिया में अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन में कोई महत्वपूर्ण सहमति नहीं बन पाई थी। उसकी वजह यह थी कि हमेशा की तरह विकसित देशों पर विकासशील देश दबाव नहीं बना पाए थे। समझौते के अंदर संपन्न औद्योगिक देशों ने दक्षिणी देशों पर उत्सर्जन कम करने का अतार्किक दबाव डाला। जबकि वहीं, उन देशों ने बुनियादी तौर पर उत्सर्जन में कमी करने और विकासशील देशों को उत्सर्जन कम करने में सहयोग करने और वातावरण के असरों के अनुकूल होने के लिए अपनी कानूनी एवं नैतिक जिम्मेदारी वहन करने से इनकार किया था। एक बार फिर, बहुसंख्यक दुनिया पर थोड़े से लोगों के सुख के लिए दबाव डाला गया था।
उसी दौरान दुनिया भर के विभिन्न जन संगठनों के कार्यकर्ता भी सम्मेलन स्थल पर उपस्थित थे। उन लोगों का कहना था कि क्लाइमेट सम्मेलन में न्याय नहीं हुआ है। उसी पृष्ठभूमि में बाली में एक साथ आए कई सामाजिक आंदोलनों एवं समूहों ने वातावरण बदलाव को रोकने एवं उसके हल के लिए कार्यवाही को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आपस में समूह के बीच सूचना के आदान-प्रदान और सहयोग के लिए एक समन्यव - क्लाइमेट जस्टिस नाऊ - स्थापित करने के लिए सहमति जताई थी। इस तरह अधिकारिक समझौतों के परिणाम के मुकाबले बाली की बड़ी सफलता यह रही कि क्लाइमेट जस्टिस के लिए विविध, वैश्विक आंदोलन के लिए एक आधार तैयार हुआ। उस समय सम्मेलन केन्द्र के अंदर एवं बाहर, कार्यकर्ताओं ने उन वैकल्पिक नीतियों एवं व्यवहारों की मांग की जो कि आजीविका और पर्यावरण की रक्षा करे। सम्मेलन के दौरान दर्जनों समान्तर कार्यक्रमों के माध्यम सरकारों, वित्तीय संस्थानों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बढ़ावा दिए जा रहे कार्बन आॅफसेटिंग, वनों के लिए कार्बन व्यापार, एग्रोफ्यूल, व्यापार उदारीकरण एवं निजीकरण जैसे वातावरण बदलाव के खोखले हलों को उजागर किया गया।
इसके बाद जुलाई 2008 में दुनिया भर के 31 देशों के सामाजिक आंदोलनों, नागरिक समाज संगठनों, मछुआरों, किसानों, वन समुदायों व आदिवासी लोगों, महिलाओं, युवाओं एवं अन्य संगठनों के 170 से ज्यादा लोग थाइलैंड के बैंकाॅक शहर में ‘‘क्लाइमेट जस्टिस सम्मेलन’’ में शामिल हुए। सम्मेलन में शामिल सदस्यों ने क्लाइमेट जस्टिस के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। सम्मेलन में आह्वान किया गया कि वातावरण के संकट का बोझ उनके द्वारा वहन किया जाना चाहिए जिन्होंने इसे पैदा किया है, न कि उनके द्वारा जो कि इसके लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। हालांकि, मौजूदा वास्तविकता यह है कि वातावरण बदलाव में वे लोग सबसे ज्यादा पीड़ीत हो रहे हैं जिन्होंने इसे पैदा नहीं किया है। इस संकट का न्यायपूर्ण हल उत्तरी देशों में एवं दक्षिणी देशों के संपन्न लोगों के अति उपभोग की समस्याओं के विरोध में होनी चाहिए। अति उपभोग की समस्या पूंजीकरण की देन है, एवं वातावरण को अस्थिर करना ही पूंजीवाद की नींव है। सम्मेलन में उत्तरी सरकारों द्वारा ग्रीनहाउस गैस में बुनियादी रूप से एवं बाध्यकारी तौर पर कमी किए जाने के लिए मानने से इनकार किए जाने की निंदा की गई। उनके द्वारा कार्बन व्यापार जैसे खोखले हलों; एग्रोफ्यूल, बड़े बांध व परमाणु ऊर्जा जैसे तकनीकी व्यवस्थाओं; एवं कार्बन विलगाव व संग्रहण जैसे वैज्ञानिक खोजों को बढ़ावा दिए जाने की भी निंदा की गई। ये तथाकथित हल वातावरण संकट को न सिर्फ बढ़ाएंगे बल्कि वैश्विक असमानता को भी बढ़ाएंगे।
सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी जिसके तहत कार्बन व्यापार का विरोध करने एवं वनों की कटाई एवं विनाश योजना से उत्सर्जन घटाने का विरोध करने पर जोेर दिया गया। यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेशंन आॅन क्लाइमेट चेंज एवं अन्य स्थलों पर चर्चाओं एवं समझौते में हस्तक्षेप एवं ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता दर्शाई गई। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानो एवं उत्तरी सरकारों द्वारा वातावरण अनुकूलन एवं दुष्प्रभाव समाप्त करने के लिए कर्ज का विरोध करना एवं उनके द्वारा अनुदान, सहायता, एवं कर्ज निरस्त्रीकरण के माध्यम से शर्तें थोपने का विरोध करने का निर्णय लिया गया। वातावरण बदलाव के अनुकूलन एवं दुष्प्रभाव कम करने के लिए किए जाने वाले समस्त सार्वजनिक वित्तपोषण में आदिवासी लोगों, मछुआरों, किसानों, महिलाओं आदि सहित प्रभावित व दरकिनार किए गए लोगों के अधिकारों को मान्यता देने की मांग पर सहमति जताई गई। विश्व व्यापार संगठन के दोहा दौर के समझौतों को निरस्त करना और खेती को डब्ल्यूटीओ से बाहर करने की मांग की गई। पर्यटन के लिए या प्राकृतिक विभीषिका से सुरक्षित करने के नाम पर तटीय समुदाय के बेदखली का विरोध करने एवं समुद्री समुदायों एवं मछुआरों को नुकसान पहुंचा सकने वाले समुद्री दीवाल, बायो-शील्ड, यूरिया एकत्रीकरण एवं कृत्रिम झाड़ियों का विरोध करने पर सहमति बनी। प्रस्तावित ‘‘ग्रीनहाउस विकास अधिकार’’ के संबंध में संगठनों एवं नेटवर्क के सदस्यों के बीच व्यापक चर्चा एवं सलाह-मशविरे की आवश्यकता एवं संयुक्त राष्ट्र वातावरण वार्ता पर उत्तरी एवं दक्षिणी अभियानों को जोड़ने की आवश्यकता जताई गई। इन सहमतियों के लिए दिसंबर 2009 में कोपेनहेगेन में होने वाले यूएन फ्रेमवर्क कन्वेशंन आॅन क्लाइमेट चेंज सम्मेलन के लिए एवं घरेलू देशों में लामबंदी करने का निर्णय लिया गया। साथ ही यह तय किया गया कि व्यापार आधारित मांगो में वातावरण की चिंता को शामिल करने एवं क्लाइमेट जस्टिस के विचारों को व्यापार अभियान से जोड़ने; यह सुनिश्चित करना कि ‘‘व्यापार जस्टिस’’ कोपेनहेगन में होने वाले यूएनएफसीसीसी सम्मेलन में विश्लेषण का केन्द्र बिंदु बने।
इस सम्मेलन के बाद इसमें शामिल सदस्यों ने अपने-अपने देशों में व्यवस्थित रूप से अभियान चलाना शुरू किया। इन अभियानों का असर कितना हुआ है इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन एक बात तो साफ है कि वैश्विक मंदी से जूझ रहे विकसित देश व्यापार एवं निवेश संबंधी किसी भी समझौते तक पहुंचने के लिए जल्दबाजी में वातावरण समझौते को मंजूरी दे दी है। इसके बावजूद भी उन देशों की नियत पर शंका कायम है। यह भी हो सकता है कि व्यापार संबंधी किसी महत्वपूर्ण सहमति पर पहुंचने के बाद वातावरण समझौते के क्रियान्वयन को ठेंगा दिखा दें। आखिर जो भी हो इस सच को उजागर होने में बहुत ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन में होने वाले वातावरण सम्मेलन में औद्योगिक देशों की मंशा की कलई खुलेगी। यदि इस नये समझौते पर विकसित देश वास्तव में गंभीर हैं तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं बल्कि यह पुराने भूल को सुधारने की कोशिश मात्र है।
Labels:
प्रकाशित लेख
आ अब लौट चलें
आ अब लौट चलें
- बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
खेती अब फायदे का सौदा नही रहा, ऐसी आम धारणा है। किसान गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। भारत जैसे देश में अब तो मौसम और पानी की स्थिति भी बहुत अनिश्चित हो गई है। देश के कई हिस्सों में किसान खुदकुशी तक कर रहे हैं। ऐसे दौर में महानगर में पला-बढ़ा कोई युवक गांव जाकर खेती करना चाहे तो उसे लोग पागल ही कहेंगे। लेकिन एक युवा ऐसा है जो दिल्ली से वापस गांव जाकर न सिर्फ खेती बल्कि जैविक खेती का प्रयोग कर रहा है जिसमें पारंपरिक खेती के मुकाबले लागत भी ज्यादा आती है।
वह युवा ‘आशीष’ जिसे खेती का व्यावहारिक ज्ञान कुछ नहीं, फिर भी खेती करने की इच्छा थी। बस इसी चाहत के साथ पहुंच गए जैविक खेती विशेषज्ञ भास्कर सावे के पास। आशीष ने बताया कि उसे खेती के बारे में कुछ नहीं मालूम लेकिन वह जैविक खेती करना चाहता है। भास्कर भाई ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘एक नर्सरी क्लास का बच्चा एक प्रोफेसर के पास पहुंच गया है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जाओ और खेती शुरू करो। जब समस्या आए तो उसका निदान खोजो, और निदान तलाशना ही वास्तविक सीख है। खेती सिद्धांत के आधार पर नहीं की जा सकती। यदि सही अर्थ में खेती करना सीखना है तो कम से कम तीन साल इसके लिए समय देना होगा।’’
सवालों में उलझा आशीष बचपन में चाहता था कि बड़ा होकर सेना में भर्ती होकर देश सेवा करे। लेकिन बड़े होकर जब दुनिया की सच्चाई देखा तो विचार बदल गए। आशीष एक संस्था के साथ जुड़कर दिल्ली एवं फिर फरीदाबाद में गरीब बच्चों को पढ़ाने लगे। इस दौरान उन्होंने देखा कि विकास के नाम पर उपजाऊ जमीनों को उद्योगों के हवाले किया जा रहा है। मन में डर सताने लगा कि भविष्य में इससे भोजन का संकट पैदा हो सकता है। सवाल उठा कि किसान खेती के बल पर आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो रहे हैं और इस पारंपरिक पेशे को क्यों छोड़ रहे हैं?
सवालों का जवाब खोजना शुरू किया तो मालूम हुआ कि खेती के लिए ज्यादा रासायनिक खाद एवं कीटनाशक प्रयोग से जमीने बंजर होती जा रही हैं। उनसे उत्पादित खाद्यान्नों में पोषक तत्व भी कम होते जा रहे हैं जो कि मानवीय स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए गहरा संकट पैदा कर सकते हैं। किसान दिनो-दिन कर्ज में डुबते जा रहे हैं, और यहां तक कि आत्महत्या भी कर रहे हैं। तमाम सच्चाईयों से रूबरू होने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वे गांव जाकर जैविक खेती करेंगे और किसानों एवं उनके बच्चों की बेहतरी के लिए काम करेंगे। लेकिन ऐसे कामों के लिए संसाधनों की व्यवस्था करना कठिन चुनौती थी। इसी बीच युवाओं में नेतृत्व क्षमता विकास के लिए कार्यरत संस्था ‘कम्यूटिनी’ ने आशीष के मार्गदर्शन का प्रस्ताव स्वीकार किया। फिर आशीष ने उत्तर प्रदेश में सुल्तानपुर जिले में अपने मूल गांव की ओर रूख किया।
आशीष कुछ महीनों भारत भूषण त्यागी एवं भास्कर भाई जैसे विशेषज्ञों से खेती की बारीकियां सीखते रहे। बात समझ में आई कि कृषि विश्वविद्यालय में खेती को सिर्फ फायदेमंद बनाना सिखाया जाता है। दीर्घकाल में जैविक खेती केमिकल आधारित खेती के मुकाबले किफायती होती है और खेती को सिर्फ उत्पादन के आधार पर ही नहीं बल्कि लागत के आधार पर भी आकलन करना चाहिए। उसने जो देखा-सीखा, जब आजमाने निकला तो गांव में युवाओं ने मजाक उड़ाया। देखा कि गांव के लोग खेती शौक से नहीं बल्कि मजबूरी में करते हैं। कहा जाता है कि जैविक खेती मौजूदा खेती व्यवस्था के मुकाबले महंगी पड़ती है। लेकिन व्यावहारिक प्रयोग से सच का दूसरा पहलु सामने आया।
आशीष ने सन 2008 के मानसून में धान की खेती के लिए केमिकल खाद युक्त और जैविक खेती का समानान्तर प्रयोग किया। धान के पौधे तैयार करने के बाद उन्हें तीन अलग-अलग तरीके से रोपा गया। पहले में डीएपी व यूरिया, दूसरे में सिर्फ डीएपी और तीसरे (जैविक) में सिर्फ कंपोस्ट खाद डाला गया। पहले हिस्से के लिए 1271 रुपये की लागत से 70 किलो, दूसरे हिस्से में 1211 रुपये की लागत से 70 किलो जबकि तीसरे में 1187 रुपये की लागत से 65 किलो धान उत्पादन हुआ। इस तरह उत्पादन के आधार पर केमिकल युक्त खेती में करीब 7 प्रतिशत ज्यादा उत्पादन हासिल हुआ, लेकिन लागत के आधार पर केमिकल युक्त खेती प्रति किलो मात्र 10 पैसे ही सस्ता पड़ा। लेकिन यदि केमिकल से होने वाले दुष्प्रभावों का आकलन किया जाय तो जैविक खेती ज्यादा फायदेमंद नजर आती है। उन्हें एक और बात समझ में आई कि खेती में सबसे ज्यादा लागत सिंचाई की वजह से होता है। मिट्टी एक जीवित वस्तु है और इसे केमिकल डालकर मृत नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही मिट्टी को पानी नहीं सिर्फ नमी की जरूरत होती है। आशीष ने जाना कि बहुत सारे कीड़े मकोड़े वास्तव में न सिर्फ फसलों को फायदा पहुंचाते हैं बल्कि दीर्घकाल में मिट्टी के लिए काफी फायदेमंद होते हैं।
आशीष मानते है कि उनके प्रयोगों से वास्तविक परिणाम का आकलन तीन साल बाद ही किया जा सकता है, क्योंकि तीन साल बाद जैविक खेती में सिंचाई लागत भी कम आएगी। आखिर उनका मुख्य उद्देश्य है कि टिकाऊ एवं सजीव खेती के प्रति लोगों का विश्वास बढ़े एवं किसान इसे अपनाकर आत्मनिर्भर बने। आशीष का मानना है कि यदि उनका प्रयास सफल होता है तो वे युवाओं के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। इस तरह वे गांव से पलायन करने वाले किसानों को विश्वास दिलाते हुए कह सकते हैं कि, ‘‘आ अब लौट चलें’’।
Labels:
प्रकाशित लेख
आत्मविश्वास की ताकत
आत्मविश्वास की ताकत
- बिपिन चन्द चतुर्वेदी
गत दिनों भीलवाड़ा में युवा अधिवेशन के समापन समारोह में कार्यक्रम संचालक ने मंच पर बैठे करीब दो दर्जन युवाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये हमारे ‘समापन समारोह के योद्धा’ हैं। अधिवेशन में देश भर से आए करीब 1200 युवाओं में से दो दर्जन नवोदित सामाजिक कार्यकर्ता मंच पर बैठे थे। देश के विभिन्न इलाकों में सामाजिक बदलाव के काम में लगे उन युवा नेतृत्वकर्ताओं में से एक थी ‘ममता’।
ममता देश के उन युवाओं की प्रतीक है जो कि बचपन से समाज में अन्याय देखते व उसे झेलते हुए बड़े होते हैं, लेकिन परिस्थितियों के आगे बेबस नहीं होते हैं। गरीबी और बेबसी का आपस में गहरा रिश्ता होता है। मनुष्य के जीवन में बेबसी अलग-अलग तरीके से दखल देती है। कई बार तो बेबसी बच्चों के मन पर गहरा असर कर जाती है। जब माता-पिता की बेबसी का असर बच्चों पर पड़ता है तो उनका विकास प्रभावित होता है और कई बार बच्चे समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता के बचपन मन में हजारो सवाल उठते थे। मन में हजारो सवाल लिए वह खुद से लड़ती रहती थी, लेकिन जवाब नहीं मिलता था। इस तरह समय से पहले बड़ी बन चुकी ममता खुद को कभी बेबस बेटी के रूप में तो कभी नासमझ इंसान के रूप में देखती थी, तो कभी बंधनों से बंधी एक लड़की के रूप में। दिन-प्रतिदिन होने वाले अन्याय को देखते-देखते बचपन की ऊंची उड़ान तो कब की थम चुकी थी, लेकिन हिम्मत फिर भी बाकी थी। लेकिन बेबसी ने बार-बार दस्तक दी और एक बार तो अपनों ने ही पिता को चन्दन की लकड़ी चोरी के झूठे मुकदमे में फंसा दिया। परिवार की हालत दर्दनाक थी, लेकिन रिश्तेदार ने कहा कि तुम मुझे अपनी जमीन दे दो तो मैं केस वापस ले लूंगा। पुलिस अधिकारी ने भी भारी रिश्वत मांगी। मजबूरन 3000 रुपये और चार बोरी गेंहू रिश्वत में देकर बाकी रकम बाद में देने का वादा किया तो जमानत मिली। लेकिन अगली सुबह वही पुलिस अधिकारी दूसरे मामले में रिश्वत लेते पकड़ा गया और उसके पिता के खिलाफ कोई सबूत न होने के कारण वे बरी हो गए। इस घटना के बाद ममता के मन की बेबसी ने आत्मविश्वास का स्वरूप ले लिया।
राजस्थान में राजसमन्द जिले के देलवाड़ा तहसील की रहने वाली ममता ने उस घटना के बाद अन्याय के खिलाफ लड़ने की ठान ली। उसने महसूस किया कि ऐसी परिस्थितियों का सामना करने वाली वह अकेली नहीं है और संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में एम.ए. की पढ़ाई भी पूरी की। इस दौरान एक सामाजिक समूह के साथ जुड़कर ममता ने सामुदायिक सशक्तीकरण के मुद्दे पर काम करना शुरू किया। वह समुदायों के बीच और खासकर महिलाओं को पंचायत से जोड़ने का काम करते हुए स्थानीय स्तर के घोटालों पर कड़ी नजर रखने लगी। ऐसे प्रयासों में उसे सूचना के अधिकार कानून से काफी मदद मिली। अपने इलाके में पंचायत, सरकारी संगठनों एवं नागरिक समाज के समन्वय से लोकतांत्रिक व्यवस्था के सही क्रियान्वयन एवं भ्रष्टाचार निवारण के उद्देश्य पर काम करने लगी। इसी बीच उसे एक मंच ‘कम्यूटिनी-दि यूथ कलेक्टिव’ मिला जहां उसे अपने इलाके में सामाजिक बदलाव के लिए मार्गदर्शन व प्रशिक्षण मिले। भले ही यूथ कलेक्टिव एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन ने ममता का मार्गदर्शन किया लेकिन बदलाव के तौर-तरीके एवं रास्ते उसने स्वयं तय किए।
राजस्थान के सामंती माहौल में ममता ने स्वयं संघर्ष की शुरूआत तो की लेकिन शुरू में कोई साथ देने को तैयार नहीं हुआ। तभी उसने देखा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) में स्थानीय स्तर पर फैली अनियमितता के खिलाफ संघर्ष करके स्थानीय ग्रामीणों को साथ लिया जा सकता है। लेकिन प्रयासों का ज्यादा परिणाम न मिलते देख ममता ने खुद नरेगा में शामिल होने का फैसला करके अपना भी जॉब कार्ड बनवाया। स्नातकोत्तर तक शिक्षित ममता ने स्वयं मेट बनकर काम करने में कोई शर्म महसूस नहीं की। खुद फावड़ा और कुदाल पकड़ कर काम किया तो श्रम के महत्व और बेहतर ढंग से समझ पाई। जिस काम को शुरू करते समय मन में आशंका थी उसी से आत्मविश्वास बढ़ा और जीवन में अगुआई और पहल के महत्व को समझ पाई। साथ ही पंचायत व्यवस्था व लोगो के प्रति खुद के नजरिए में बदलाव आया। उस इलाके में नरेगा से जहां ग्रामीण गरीबों को 100 दिन का रोजगार मिल पाता था वहीं उन्हें गांव के दबंग लोगों के बदले भी काम करना पड़ता था। लेकिन खुद मेट बनकर काम करने के बाद सबसे बड़ा सुधार यह हुआ कि राजनतिक ताकत वालों की मनमानी के बल पर डंडा मेट का काम करके मुफ्त में पैसा पाने वालों के रास्ते बंद हो गए। यहां तक कि लोगों को पहले दिहाड़ी कम मिलती थी और काम छूट जाने के डर से लोग शिकायत नहीं करते थे। ममता के प्रयास से ग्रामीण महिलाओं में आत्मविश्वास तो बढ़ा ही बल्कि 100 दिन का रोजगार पूर्ण करने पर उन्हें प्रोत्साहन राशि भी हासिल हुई। आज ममता के हिम्मत से उसके साथ लोग जुड़ते गए और कई ऐसी महिलाएं तैयार हुई हैं और समूह में लीडरशिप ले रही हैं। उस इलाके में सुशीला, सीताबाई, पुष्पा, चंदा, कलावतीबाई एवं दुर्गा आदि लोग नरेगा में काम करने के साथ निगरानी भी करती हैं और परेशानी होने पर आवाज उठाती हैं।
हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान ममता से कोलकाता में फिर मुलाकात हुई। आत्मविश्वास से सराबोर वह अल्हड़ बाला गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर के बांग्ला गीत ‘‘जोदि तोर डाक सुने केउ ना आशे, तोबे एकला चोलो रे’’ गाने की कोशिश कर रही थी। हमारे एक अन्य राजस्थानी साथी गोपाल को कुछ साथियों ने कहा कि कोलकाता में राजस्थान की पहचान है ‘बालिका वधु’। भारत में सास-बहु सीरियलों पर आधारित कार्यक्रम ‘बालिका वधु’ एक चहेता टीवी कार्यक्रम है, जो राजस्थान में बालिकाओं की छोटी उम्र में होने वाले विवाहों की पृष्ठभूमि पर बना है। यह बात भी सही है कि राजस्थान के गांवों एवं कस्बों में आज भी काफी संख्या में बाल विवाह होते हैं। लेकिन ममता को देखकर लगा कि ममता राजस्थानी है, गरीबी में पली है लेकिन उसकी पहचान ‘बालिका वधु’ नहीं है। ममता स्वयं अपनी पहचान है। मेरा मानना है कि ममता जैसे लोग समापन समारोह के योद्धा नहीं बल्कि स्वागत समारोह के योद्धा होने चाहिए। भले ही ममता ने सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में अभी शुरूआत ही की है और शायद उसे एक लम्बी यात्रा करनी है। लेकिन एक बात तो उसने साबित की है कि ‘‘बेबसी से बड़ा होता है आत्मविश्वास।’’
(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, 8 जून 2009)
Labels:
प्रकाशित लेख
बेहतर विकल्प है जैविक खेती
बेहतर विकल्प है जैविक खेती
- बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
जैविक खेती से होने वाले फायदे के बारे में नित नये तथ्य उभरकर आ रहे हैं। जिससे यह बात साबित होती जा रही है कि जैविक खेती न सिर्फ दीर्घकाल में बल्कि तात्कालिक तौर पर भी फायदेमंद है। जैविक खेती से जहां एक ओर रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग न होने से जमीन की उत्पादक क्षमता में लगातार बढ़ोतरी होती है वहीं जमीन में नमी बरकरार रहने से यह सूखा प्रभावित क्षेत्रो के लिए काफी व्यावहारिक है। जैविक खेती को ज्यादा व्यवहारिक बनाने के लिए नित नये प्रयोग भी हो रहे हैं। जब कोई प्रयोग या फिर कोई अध्ययन कोई प्रतिष्ठित संस्था करती है तो उस पर लोगों का विश्वास और भी प्रबल होता है। इस बार संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी महत्वपूर्ण संस्था ने संकटग्रस्त पूर्वी अफ्रीका में एक अध्ययन करवाया है, जिसके नतीजे काफी उत्साहवर्द्धक हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि यदि पूर्वी अफ्रीका में जैविक खेती को अपनाया जाय तो पूरे देश में भूखमरी की समस्या से निपटा जा सकता है।
अध्ययन ने साबित किया है कि जैविक खेती से अनाज के पैदावार में तो बढ़ोतरी हुई ही साथ में मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार से छोटे किसानों की परोक्ष आमदनी में भी बढ़ोतरी हुई। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के प्रमुख श्री अचिम स्टेनर का तो यहां तक कहना है कि जैविक खेती द्वारा पूरे विश्व को जितना अनाज उपलब्ध कराया जा सकता है वह उम्मीद से कहीं ज्यादा होगा।
साठ के दशक में हुई हरित क्रांति का लाभ अफ्रीका के निवासियों को नहीं मिला था। जिन देशों में हरित क्रांति का फायदा हुआ था वहां एक मोटे आकलन के अनुसार एक व्यक्ति को पहले के मुकाबले करीब 25 प्रतिशत ज्यादा खाद्यान्न उपलब्ध हुआ है। जबकि अफ्रीकी देशों में प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की उपलब्धता 10 प्रतिशत घट गई। हालांकि अफ्रीकी महाद्वीप में बढ़ती आबादी, घटती वर्षा, जमीनों की घटती उत्पादकता, और खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतें भी इसके महत्वपूर्ण कारक रहे हैं। अफ्रीकी सरकारों की पारंपरिक सोच यह रही है कि इस कमी को पूरा करने के लिए आधुनिक और तकनीकी खेती ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन अफ्रीकी सरकारें अपने पारंपरिक तरीके से खाद्यान्नों की कमी पूरा कर पाने में नाकाम रही हैं।
अब वैश्विक स्तर पर खाद्यान्नों की कमी ने सरकारों और विशेषज्ञों को खेती के तौर तरीके में बदलाव के प्रति सोचने को मजबूर किया है। कुछ देशों की सरकारें तो वैज्ञानिकों को जीन परिवर्द्धित (जीएम) खाद्यान्नों के लिए शोध करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। जीएम खाद्यान्नों के मामले में दावा किया जाता है कि इससे खाद्यान्न उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ कई अन्य फायदे भी हैं। लेकिन इन खाद्यान्नों के व्यवहारिक प्रयोग इस बात को साबित कर रहे हैं कि इससे खेती और मनुष्यों के स्वास्थ्य संबंधी नई परेशानियों का न्यौता दिया जा रहा है। फिर उनसे कैसे निपटा जाएगा? यह तो वहीं बात हुई जैसे भेड़िये के आतंक से निपटने के लिए शेर को बुलाया जा रहा है, लेकिन शेर के आतंक से निपटने के लिए किसे बुलाया जाएगा? इसलिए पूरे विश्व में विशेषज्ञों द्वारा इसका व्यापक विरोध भी हो रहा है। इंग्लैण्ड में सरकार और विशेषज्ञों ने तो इसे पूरी तरह नकार दिया है। जीएम खेती के लिए पेटेंट वाली महंगी बीज की आवश्यकता होने के कारण खेती की लागत भी ज्यादा आती है। हालांकि पारंपरिक खेती के समर्थकों का मानना है कि जैविक या जीएम खेती के बजाय यदि बेहतर बीज, फसल चक्र परिवर्तन, अच्छी सिंचाई और अच्छे बाजार की उपलब्धता हो तो अच्छी खेती संभव है। लेकिन अफ्रीकी देशों में सूखा एक समस्या है वहां अच्छी सिंचाई व्यवस्था बहुत खर्चीली है और कई जगहों पर तो असंभव है। ऐसे में सूखे इलाकों में पारंपरिक खेती के प्रति भी हमेशा जोखिम कायम रहता है।
जबकि इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा कराए गए मौजूदा शोध का निष्कर्ष है कि छोटे स्तर पर की जाने वाली जैविक खेती से बगैर कोई पर्यावरणीय व सामाजिक क्षति के उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सकती है। अध्ययन के लिए अफ्रीकी देशों में उन इलाकों का चयन किया गया जहां निजी या सहकारी स्तर पर जैविक खेती की जाती है। इस तरह चैबीस अफ्रीकी देशों में 114 फार्मो में पूरे साल किए गए विश्लेषण में यह बात साबित हुई कि जहां जैविक या कम केमिकल वाली खेती की गई वहां उत्पादन में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई। इससे पूर्वी अफ्रीका में औसत उत्पादन बढ़कर 128 प्रतिशत तक हो गई है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि जैविक खेती पारंपरिक खेती और केमिकल आधारित खेती के मुकाबले बेहतर परिणाम देते हैं। इससे कई पर्यावरणीय फायदे भी हैं, जैसे कि इससे भूमि की उत्पादकता बढ़ती है, भूमि में नमी बरकरार रहती है और इस तरह इसमें सूखे से लड़ने की क्षमता होती है।
अफ्रीकी देशो में हुए अध्ययन के नतीजे भारत के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं। भारत में जो इलाके नियमित सूखे से प्रभावित रहते हैं उन इलाकों में इसे अपनानाा काफी फायदेमंद हो सकता है। भारत सरकार द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सन 2005 में लगभग 77,000 हेक्टेअर जमीन में जैविक खेती हुई थी। इन जमीनों पर 120,000 टन जैविक खाद्यान्नों का उत्पादन हुआ था। केन्द्रीय कृषि और सहकारिता मंत्रालय के अनुसार सन 2003-04 में कुल 1408.80 लाख हेक्टअर जमीन में खेती हुई थी। इसमें से 551 लाख हेक्टेअर जमीन में विभिन्न स्रोतो से सिंचाई उपलब्ध हो पाई थी। इस तरह 857.8 लाख हेक्टेअर जमीन वर्षा पर ही आधरित हैं। इनमें से बहुत सारे इलाके काफी दुर्गम हैं जहां पारंपरिक सिंचाई के साधन उपलब्ध कराना काफी खर्चीला है। यदि सरकार इनमें से सूखा प्रभावित व दुर्गम क्षेत्रों को ध्यान में रखकर जैविक खेती को प्रोत्साहन दे तो इसके बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। लेकिन जो भी हो यूएनइपी की मौजूदा रिपोर्ट का मानना है कि इससे विश्व की खाद्यान्न समस्या का हल हो सकता है और इस तरह गरीबी निवारण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। तो भारत को भी इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान देने से पीछे नहीं रहना चाहिए।
(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, 25 मई 2009)
Labels:
प्रकाशित लेख
Subscribe to:
Posts (Atom)