Friday, December 18, 2009

औद्योगिक ईकाई भी सहेज सकते हें वर्षाजल

औद्योगिक ईकाई भी सहेज सकते हें वर्षाजल

  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

बारिश के पानी से देश के जिन इलाकों में बाढ़ का कहर बरपता है उनमें पश्चिम बंगाल भी प्रमुख है। लेकिन राज्य के बर्दवान जिले के औद्योगिक क्षेत्र में एक संयंत्र ने बारिश के पानी का उपयोग करके संयंत्र के लाभ में बढ़ोतरी की है। सोचने वाली बात है कि क्या बारिश के पानी से औद्योगिक उत्पाद की लागत कम की जा सकती है? बात कुछ अजीब सी लगती है लेकिन है बिल्कुल सच, और यह उदाहरण पेश किया है पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में दुर्गापुर में स्थित एक इस्पात ईकाई ने। जिले में स्थित एक द्वितीयक इस्पात ईकाई के 200 तापीय डिपोलीमेराइजेशन संयंत्र साल के सात महीने पूरी तरह वर्षाजल पर ही निर्भर रहते हैं। यह उपलब्धि तब हासिल हुई है जबकि बर्दवान जिले में पिछले तीन सालों में वर्षा दर में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। दुर्गापुर पश्चिम बंगाल का एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है। दुर्गापुर शहर पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में स्थित है, जो कि दिल्ली से कोलकाता के मुख्य रेलवे लाइन में पड़ता है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से जुड़ा हुआ है और कोलकाता महानगर से 158 किमी की दूरी पर है। यहां का मौसम उष्णीय है और साल के तीन महीने जुलाई, अगस्त एवं सितंबंर में कुल बारिश का 80 प्रतिशत से ज्यादा बरसता है। जिले में औसत सलाना वर्षा लगभग 1330 मिमी होती है।

इस औद्योगिक ईकाई के सकारात्मक पहल को देखते हुए आसनसोल दुर्गापुर विकास प्राधिकरण ने राष्ट्रीय राजमार्ग-2 के पास दुर्गापुर नगर निगम के वार्ड संख्या 28 की चार एकड़ परती जमीन को वर्षा जल संचयन के प्रयोजन के लिए मुफ्त में उपलब्ध कराया है। इस जमीन पर ‘एलिगेंट स्टील रोलिंग मिल्स’ ने 172000 वर्गफुट क्षेत्रफल का तालाब खुदवाया है। कंपनी के महाप्रबंधक श्री सुमंत भट्टाचार्य का दावा है कि उनके संयंत्र में प्रतिमाह रुपये 9 लाख पानी के बिल की बचत होती है। इस नयी प्रणाली से संयंत्र को प्रतिदिन 400 किलोलीटर पानी आपूर्ति की जाती है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से हमारे संयंत्र संचालन का विचार पूरी तरह बदल चुका है। इससे हमें दोतरफा फायदा हो रहा है। एक तो अब संयत्र पूरे साल काम करता है और कंपनी को पानी का बिल भी कम चुकाना पड़ता है। इस तरह कंपनी के उत्पाद की लागत भी पहले के मुकाबले कम हुई है।

असल में इस विचार की शुरूआत तब हुई जब दो साल पहले तक हर साल माॅनसून के दौरान संयंत्र का एक हिस्सा पानी से डूब जाता था। संयंत्र ऐसे स्थल पर स्थित है जो कि थोड़ा निचला इलाका है। इस तरह निकट के इलाके बिधाननगर एवं विश्वकर्मा नगर में बरसने वाले पानी का काफी हिस्सा बहकर संयंत्र में प्रवेश कर जाया करता था। बारिश के पानी से हर साल संयंत्र के काफी कीमती उपकरण पानी में डूब जाया करते थे और काफी नुकसान हो जाया करता था। इससे साल के करीब 4 महीने उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता था। इससे निपटने के लिए संयंत्र के प्रबंधकों ने बारिश के पानी को संयंत्र में आने से रोकने की योजना बनायी। साथ ही उस पानी को सहेजकर उपयोग करने की भी योजना बनी। इसके बाद संयंत्र के पास में खाली पड़े जमीन को उपयोग करने के लिए कंपनी ने नगर निगम से गुहार लगायी। नगर निगम ने कोई स्थायी निर्माण न करने के शर्त पर कंपनी को मुफ्त में 4 एकड़ जमीन उपलब्ध करा दी। इस 4 एकड़ जमीन में वर्षा जल संचयन के लिए एक तालाब की खुदाई की गई। इस तरह कंपनी ने दोहरे फायदे का भरपूर लाभ उठाना शुरू किया। कंपनी का दावा है कि इस तरह की पहल करने वाली वह क्षेत्र की पहली कंपनी है।

बारिश के एकत्र पानी को ट्रीटमेंट करके संयंत्र के भट्ठियों एवं कूलिंग प्रणाली में उपयोग लायक बनाया जाता है। वर्षाजल में खनिज की मात्रा न्यूनतम होने के कारण ट्रीटमेंट के दौरान पानी का पीएच मान का नियंत्रित करना कराना भी आसान होता है। वर्षाजल को ट्रीटमेंट करने की लागत भी कम आती है। कंपनी के अध्यक्ष ऋषि कुमार का कहना है कि, सरकारी नियंत्रण वाली दुर्गापुर प्रोजेक्ट्स लिमिटेड से पहले संयंत्र को एवं घरेलू उपयोग के लिए पानी की आपूर्ति होती थी। लेकिन अब साल के सात महीने में कंपनी को सिर्फ पेयजल के लिए ही पानी लेना पड़ता है। जबकि इस अवधि में संचित वर्षा जल से औद्योगिक उपयोग की आवश्यकता पूरी हो जाती है और इससे करीब रुपये 60 लाख की बचत होती है। इस तरह अब माॅनसून के दौरान भी उत्पादन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती है और बारिश के पानी का पूरा उपयोग भी हो जाता है। हालांकि तालाब का जलग्रहण क्षेत्र काफी ज्यादा है और भविष्य में इसकी संग्रहण क्षमता बढ़ाने की पूरी गुंजाइश मौजूद है। लेकिन अभी फिलहाल उसमें करीब 100,000 किलोलीटर पानी संचय हो पाता है। जबकि एकत्र होने वाले पानी में से प्रति वर्ष करीब 85,000 किलोलीटर का ही उपयोग हो पाता है। इस तरह संयंत्र में जल आपूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भरता भी कम हुई है।

इस इस्पात ईकाई की उपलब्धि से दुर्गापुर नगर निगम भी काफी उत्साहित है। निगम के जल आपूर्ति के प्रभारी श्याम प्रसाद कुंडू का कहना है कि यह प्रयास काफी काबिले तारीफ है और उम्मीद करते हैं कि यहां की अन्य कंपनियां भी एलिगेंट स्टील्स के उदाहरण को अपनाएंगी। यदि इस अनूठे उदाहरण को देश भर के ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्र में आजमाया जाय तो संभव है कि औद्योगिक जल आपूर्ति लागत का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्रतिवर्ष बचाया जा सकता है।

प्रकाशित: 19.09.09 /http://hindi.indiawaterportal.org

izdkf'kr % vk¶Vj czsd] 21 flrEcj 2009

निहित स्वार्थ का पर्याय ‘नदी जोड़ परियोजना’

निहित स्वार्थ का पर्याय ‘नदी जोड़ परियोजना’
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी के सबसे चहेते नेता राहुल गांधी ने चेन्नई में एक प्रेस सम्मेलन में कहा कि नदी जोड़ योजना भारत के पर्यावरण के लिए बहुत ही विनाशकारी है। राहुल गांधी के बयान के अगले ही दिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री श्री के करूणनिधि ने इस परियोजना के पक्ष में दलील दी। इस तरह यह मुद्दा एक बार फिर जीवंत हो गया है। अब यदि प्रमुख सत्ताधारी दल के एक प्रमुख नेता की ओर से ऐसे बयान आ रहे हैं तो इसका निहितार्थ जानना भी जरूरी है। यह तो जानी हुई बात है कि नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना भारत में जल संसाधन क्षेत्र में अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना है। सन 2001 के कीमत स्तर पर इस पूरी परियोजना की प्रस्तावित लागत ‘पांच लाख साठ हजार करोड़’ आंकी गई थी। हालांकि वास्तविक लागत इससे कई गुना ज्याादा होने की संभावना है। परियोजना के अंतर्गत कुल 30 नदी जोड़ प्रस्तावित हैं, जिनमें से 14 हिमालयी भाग के और 16 प्रायद्वीपीय भाग के हैं। इस प्रस्तावित परियोजना पर तमाम विशेषज्ञ पहले से ही अपनी आपत्ति जाहिर करते रहे हैं। यह अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ तो भारत सरकार की केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय इस परियोजना पर आगे बढ़ने की बात कहती है तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के ही राहुल गांधी एवं जयराम रमेश सरीखे प्रमुख नेता इसे विनाशकारी बताते हैं। चाहे जो भी हो, जब प्रस्तावित 30 जोड़ों में से एक की भी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार न हो तो इस परियोजना के पक्ष में दावे खोखले नजर आते हैं।

पूरी परियोजना का मूल आधार है कि जल आधिक्य वाली नदियों का पानी जलाभाव वाली नदियों में डाला जाएगा। लेकिन सच यह है कि भारत में अभी तक किसी भी अधिकृत एजेंसी ने इस तथ्य का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया है। यह बात साफ है कि ये परियोजनाएं विभिन्न राज्य सरकारों के आपसी समझौते से ही आगे बढ़ सकती हैं। तो फिर राज्यों के आपसी खीचातान की वजह से सरकारों का निहित स्वार्थ भी शामिल हो जाता है। राज्य सरकारों के ऐसे ही मोलभाव का उदाहरण है ‘केन-बेतवा नदी जोड़’। इसी परियोजना पर सबसे पहले आगे बढ़ने का सरकार का इरादा है। ‘केन-बेतवा नदी जोड़’ उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के बीच का मामला है और इस पर डीपीआर बनाने का काम जारी है। मध्य प्रदेश में छतरपुर व पन्ना जिलों के सीमा पर केन नदी पर मौजूदा गंगऊ बैराज के अपस्ट्रीम में 73.2 मीटर ऊंचा बांध प्रस्तावित है। इस बांध से रोके जाने वाले पानी को 231 किमी लम्बी नहर के माध्यम से बेतवा नदी में डाले जाने का प्रस्ताव है। परियोजना में सिर्फ एक बांध से करीब 10 हजार हेक्टेअर से भी ज्यादा जमीन डूब में आएगी जबकि परियोजना में कुल 7 बांध बनने वाले हैं। परियोजना से 6.5 लाख हेक्टेअर जमीन में सिंचाई एवं 72 मेगावाट बिजली उत्पादन का प्रस्ताव है। कथित तौर पर इससे मध्य प्रदेश को ज्यादा लाभ होने वाला है, लेकिन उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से डूब में आएंगे। लेकिन यदि यहां पर उत्तर प्रदेश सरकार समझौता करती है तो दूसरी तरफ से उसे लाभ भी चाहिए।

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश सरकार एक महत्वाकांक्षी परियोजना ‘पंचनंदा बांध’ के माध्यम से लाभ लेना चाहती है। इस परियोजना को उत्तर प्रदेश की पिछली मुलायम सिंह सरकार ने आगे बढ़ाने की भरसक कोशिश की थी। इस परियोजना के तहत यमुना, चंबल, क्वारी, सिंध और पाहुज नदियों के संगम के नीचे यमुना नदी पर 25 मीटर ऊंचा हाई ग्रेविटी बांध बनाए जाने का प्रस्ताव है। परियोजना से उत्तर प्रदेश की 33,812 हेक्टेअर एवं मध्य प्रदेश की 17,201 हेक्टेअर जमीन डूब में आएगी। इस परियोजना से 4.42 लाख हेक्टेअर जमीन की सिंचाई एवं 20 मेगावाट बिजली उत्पादन का प्रस्ताव है। हालांकि मध्य प्रदेश का दावा है कि केन्द्रीय जल आयोग के दावे के विपरीत इस परियोजना से 15 के बजाय 21 गांव डूब में आएंगे।

जिस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार एवं मध्य प्रदेश में बाबूलाल गौड़ की सरकार थी उस समय दोनों ने पंचनंदा बांध पर आगे बढ़ने की सैद्धांतिक सहमति दी थी। लेन-देन का मामला साफ था कि केन-बेतवा नदी जोड़ में थोड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश को तो पंचनंदा बांध में मध्य प्रदेश सरकार को नुकसान हो रहा था। लेकिन सोचने बाली बात तो यह है कि ‘केन-बेतवा’ परियोजना से उत्तर प्रदेश के जिन इलाकों के लोगों का नुकसान होने वाला है उन्हें तो ‘पंचनंदा’ बाध से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। इसी तरह ‘पंचनंदा’ बांध से मध्य प्रदेश के जिन इलाकों का नुकसान हो रहा है उन्हें तो ‘केन-बेतवा’ परियोजना से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। हां, एक बात साफ है कि इन दोनो परियोजनाओं से मुलायम सिंह एवं बाबूलाल गौड़ के चहेते इलाकों को जरूर फायदा होने वाला है। लेकिन अब दोनों ही मुख्यमंत्री की सीट पर काबिज नहीं हैं। बदली हुई परिस्थितियों में अब मध्य प्रदेश सरकार की आपत्ति के कारण केन्द्र सरकार ने फिलहाल इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

हालांकि दोनों ही परियोजनाएं राज्यों के आपसी विवादों से घिरी हुई हैं। इतना ही नहीं इस मामले में एक तीसरी नदीजोड़ परियोजना ‘पार्बती-कालीसिंध-चंबल’ का विवाद भी जुड़ा हुआ है। एक परियोजना से होने वाली पानी की कमी को दूसरी परियोजना के मोलभाव से पूरा करने का निहित स्वार्थ तो जागजाहिर हो ही रहा है। अब कोई परियोजना आगे बढ़े या स्थगित हो, एक बात तो साफ है कि इससे सरकारों के निहित स्वार्थ का उदाहरण तो जगजाहिर होता ही है।

प्रकाशित: 19.09.09/ http://hindi.indiawaterportal.org

‘‘सूचना के अधिकार’’ का कमाल


मौसम विभाग को नीति बदलने का आदेश

जी हां, भारत के मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) को अपनी नीति बदलनी होगी। खास बात यह है कि यह कमाल है ‘‘सूचना के अधिकार का’’। जो मौसम विभाग अब तक देश भर के विभिन्न इलाकों में वर्षा के आंकड़ों को बेचकर पैसे कमाता रहा है अब वे आम लोगों को सार्वजनिक रूप से बगैर कीमत के उपलब्ध हो सकेंगे। इस संबंध में यह आदेश अभी हाल ही में केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
मामला काफी दिलचस्प है, हुआ यूं कि दिल्ली स्थित संस्था ‘‘सैण्ड्रप’’ की ओर से बिपिन चन्द्र ने मार्च 2008 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के समक्ष सूचना के अधिकार के तहत एक याचिका दाखिल की। याचिका में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के 6 जिलों के 5 साल के लिए वर्षा के मासिक आंकड़ों सहित अन्य आंकड़ों की मांग की गई। लेकिन याचिका के जवाब में विभाग के मुख्य सूचना अधिकारी टी. ए. खान ने कहा कि, ‘‘मौसम के आंकड़ों की आपूर्ति करना सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में नहीं आता है।’’ सैण्ड्रप को यह जानकर काफी अचम्भा हुआ, लेकिन मामले में दिलचस्पी बढ़ गई। इसके बाद विभाग के अपील प्राधिकारी के पास अपील करने पर भी नतीजा शून्य रहा। मामला आगे बढ़ते हुए सीआईसी के पास पहुंचा, जहां, सुनवाई की तारीख 6 जनवरी 2009 तय हुई।

सीआईसी के समक्ष सैण्ड्रप की ओर से हिमांशु ठक्कर मामले की सुनवाई के लिए उपस्थित हुए, जबकि आईएमडी की ओर से एडीजीएम ए. के. भटनागर एवं डीडीजीएम टी. ए. खान उपस्थित हुए। सूचना आयुक्त श्री ए. एन. तिवारी के सामने हिमांशु ठक्कर ने दलील दी कि आईएमडी को भारत के सभी जिलों के वर्षा के मासिक और सालाना आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने चाहिए, और इसके लिए कीमत अदा करने जैसी कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। सवाल यह है कि जनता के पैसे से चलने वाली एक संस्था वर्षा जैसे प्राथमिक और आवश्यक आंकड़े देने से कैसे मना कर सकती है? इतना ही नहीं, जहां कई राज्य सरकारें अपने वेबसाइट पर तहसील वार दैनिक आंकड़े उपलब्ध कराती हैं वहीं आईएमडी अब तक किसी भी स्तर पर इन प्राथामिक आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से नहीं उपलब्ध कराती थी।

मामले की सुनवाई के 10 दिन बाद सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता का आवेदन सुनवाई योग्य है....। निःसंदेह इन आंकड़ों के प्रसार से सार्वजनिक हित जुड़ा हुआ है, और इन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक सार्वजनिक प्राधिकरण होने के नाते मौसम विभाग को ये आंकड़े नियमित रूप से वेबसाइट पर उपलब्ध कराना चाहिए ताकि जिन्हें आवश्यकता हो वे उसे हासिल कर सके। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका है और विभाग ने अपने जवाब से मामले को और भी जटिल बना दिया है। आयुक्त ने मौसम विभाग को तीन सप्ताह में बगैर किसी कीमत के सैण्ड्रप को आंकड़े उपलब्ध कराने का आदेश दिया। साथ ही आईएमडी के महानिदेशक को आदेश दिया कि वे इस संदर्भ में अपनी नीति की समीक्षा करके एक माह में जवाब प्रस्तुत करें।

सैण्ड्रप ने इस आदेश पर खुशी जताते हुए उम्मीद जतायी कि भविष्य में मौसम विभाग के ये आवश्यक आंकड़े आम लोगों को उपलब्ध हो पाएंगे! पूरी प्रक्रिया में लगभग एक साल लग गए लेकिन नतीजा सकारात्मक रहा। मांगे गए सभी आंकड़े सैण्ड्रप को उपलब्ध हो चुके हैं और अब ये सैण्ड्रप की वेबसाइट (www.sandrp.in/news) पर उपलब्ध हैं।

प्रकाशित: 17.07.09/http://hindi.indiawaterportal.org/

खेती के लिए नई उम्मीद: एसआरआई


खेती के लिए नई उम्मीद: एसआरआई
  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी
इस साल भी मानसून ने आंख मिचैली का खेल खेलना शुरू कर दिया है। भारत के सबसे दक्षिणी हिस्से केरल में दक्षिण पश्चिम मानसून ने निर्धारित समय से 4 दिन पहले ही दस्तक दी थी। इससे उत्साहित मौसम विभाग ने घोषणा कर दी कि इस वर्ष देश में मानसून सामान्य रहेगा। जब देश की एक अधिकारिक संस्था कुछ कह रही हो तो मानना ही पड़ेगा। इस सरकारी संस्था की बात पर आकर देश भर में किसानों ने खरीफ की फसल की तैयारी शुरू कर दी। हमारे यहां खरीफ के फसल के तौर पर मुख्य रूप से धान की खेती की जाती है और धान की खेती के लिए मुख्यतः रोपाई की विधि अपनाई जाती है। इसलिए मानसून सामान्य होने के खबर के साथ ही देश भर में किसानों ने धान के पौधे तैयार करने के लिए बीज बो दिए। लेकिन इसी बीच मानसून भटक गया, ऐसा हमारा नहीं बल्कि हमारे ‘मौसम विभाग’ का कहना है। लेकिन लगता है कि हमारे मौसम विभाग की व्यवस्था ही भटक गई है। इस तरह देश भर में ज्यादातर जगह मानसून 10 से 15 दिन पीछे हो गया है और संभव है इस साल औसत वर्षा सामान्य से कम भी हो! अब किसानों को भी धान की रोपाई के लिए इंतजार करना पड़ा क्योंकि भारत में आज भी ज्यादातर जगह धान की खेती वर्षा के भरोसे ही होती है। धान को ज्यादा पानी वाला फसल माना जाता है और जब पानी की व्यवस्था ही अनिश्चित हो तो फसल की लागत बढ़ती जाती है। तो ऐसी अनिश्चित स्थिति का क्या हल हो सकता है?

जहां आज एक तरफ खेती की लागत दिनो-दिन बढ़ती जा रही है और ज्यादातर किसान वैकल्पिक पेशा अपनाने को बाध्य हैं। ऐसे में यदि कोई आपसे कहे कि धान की खेती का ऐसा तरीका इजाद हुआ है जिससे बीज, खाद, पानी की लागत कम हो जाएगी और उत्पादन दुगुनी हो जाएगी तो यह चैंकाने वाली बात नजर आती है। हो सकता है कि ज्यादातर लोग इस दावे को नकार दें, लेकिन यह सच है और विश्व के कई देशों में एवं भारत के कई राज्यों में इसे सफलतापूर्वक आजमाया भी जा चुका है।

आइए इस दावे की सच्चाई का आकलन करें। झारखंड में रांची जिले के एक छोटे से गांव के निवासी ‘निकादम तुती’ सिर्फ एक एकड़ असिंचित जमीन से ही अपने पांच सदस्यों के परिवार का भरण पोषण कर लेते हैं। जबकि दो साल पहले तक इतनी ही जमीन से उनका सिर्फ चार महीने का खर्च चल पाता था। लेकिन जब ‘प्रदान’ नामक एक संस्था ने उन्हें धान की खेती करने की नई पद्धति से परिचय कराया तो उनकी जिंदगी ही बदल गई। इस पद्धति से तुती को आधे एकड़ खेत में एक फसल से 16 कुंतल धान मिल जाता है जबकि पहले सिर्फ 3 कुंतल ही मिल पाते थे। आंकड़े तो चैकाने वाले हैं लेकिन उससे भी ज्यादा चैंकाने वाली बात यह है कि इस खेती में बीज एवं पानी की लागत कम आती है। इतना ही नहीं इसमें कोई संकर नस्ल का बीज भी प्रयोग नहीं किया जाता है बल्कि सिर्फ खेती की तकनीक में बदलाव लाकर ऐसा किया गया है। इस तकनीक का नाम है ‘एसआरआई’ अर्थात सिस्टम आॅफ राइस इंटेसिफिकेशन अर्थात चावल की पैदावार बढ़ाने की तरकीब।

एसआरआई नाम से प्रचलित यह पूरी तरह मानवीय तकनीक है और इसका विकास सन 1983 में मेडागास्कर में हुआ था। इसलिए कुछ लोग इसे ‘मेडागास्कर पद्धति’ भी कहते हैं। इस तकनीक में जिसमें बीज की लागत 50 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक घट सकती है, जबकि सिंचाई की लागत 50 प्रतिशत तक घट सकती है और खास बात यह कि इसमें रासायनिक खाद का उपयोग नहीं किया जाता है। मोटे तौर पर यह माना जाता है कि पौधों के पोषण के लिए बीज के अलावा मिट्टी, धूप, पानी एवं वायु की जरूरत होती है। पारंपरिक धान की खेती में फसल को पानी के माध्यम से ज्यादा पोषण देने की कोशिश की जाती है। ऐेसे में जब खेतों में पानी भरा होता है तो जड़ों तक हवा और धूप की पहुंच कम होती है। ऐसे में रासायनिक खाद के माध्यम से पौधों को ज्यादा पोषण देने की कोशिश की जाती है। मिट्टी में ज्यादा केमिकल उपयोग होने के कारण मिट्टी का पूरा पोषण पौधों को नहीं मिल पाता है, जिससे पौधें का विकास प्रभावित होता है। जबकि एसआरआई के अंतर्गत पौधों को हवा एवं धूप एवं मिट्टी के माध्यम से ज्यादा पोषण पहुंचाने की कोशिश की जाती है। पारंपरिक खेती में करीब 25 दिन के पौधों को खेत में रोपा जाता है। जबकि एसआरआई में करीब 10-12 दिनों के पौधों को ही रोपा जाता है। इसमें यह ध्यान दिया जाता है कि पौधों को उखाड़ने के बाद आधे घंटे के अंदर एवं एक-एक पौधे ही रोपे जाएं। रोपाई के समय विशेष तौर पर ध्यान दिया जाता है कि सभी पौधों के बीच समान दूरी कायम रहे। यह दूरी 6 इंच से 16 इंच तक हो सकती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि खर-पतवार की निराई ठीक से हो सके और पौधों को मिलने वाला पोषण खर-पतवार के हिस्से में न जा पाए। इसमें खास ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि खेत में सिर्फ नमी बनी रहे और इस तरह खेत में कुछ समय ही पानी भरने की जरूरत होती है। इस पद्धति में कंपोस्ट खाद प्रयोग करने की ही सलाह दी जाती है। इस पद्धति के अंतर्गत बेहतर पोषण के कारण पौधे काफी स्वस्थ होते हैं और प्रति पौधे धान का उत्पादन काफी ज्यादा होता है। पारंपरिक खेती के अंतर्गत एक किलो चावल उत्पादन के लिए 3000 से 5000 लीटर तक पानी की जरूरत होती है जबकि एसआरआई में इसका करीब आधा ही लगता है।

भारत में धान ही मुख्य फसल है और खेती किए जाने वाले कुल इलाकों के 23 प्रतिशत में धान की खेती होती हैं। भारत में यह इसलिए भी ज्यादा व्यवहारिक है क्योंकि देश में जिन इलाकों में धान की खेती होती है कि उनमें से 44 प्रतिशत इलाके असिंचित हैं और वे पूरी तरह वर्षा पर ही आश्रित हैं। वर्तमान में यह 34 देशो में सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है। जबकि भारत में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा झारखंड पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में काफी जगह अपनाया जा रहा है। ज्यादातर जगहों पर किसान इसे एनजीओ के माध्यम से अपना रहे हैं। जहां एसआरआई के प्रति भारत में बहुत सुस्ती देखी जा रही है वहीं चीन एवं दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में इसे बहुत तेजी से अपनाया जा रहा है। भारत में इसकी सुस्त चाल के पीछे राज्य सरकारों द्वारा तर्क दिया जाता है कि यह काफी श्रम आधारित है। लेकिन वास्तविकता यह है कि खेती में मशीनों को बढ़ावा देने वाले लोग या बड़े स्तर पर खेती करने वाले लोग इसे बढ़ावा देने से घबराते हैं, क्योंकि इससे उनका नियंत्रण समाप्त हो सकता है।

छत्तीसगढ़ में किसानों के साथ काम कर रहे जैकब नेल्लिथेलम का मानना है कि राज्य में एसआरआई पद्धति को अपनाकर न सिर्फ वर्षा की अनिश्चतता से बचा जा सकता है बल्कि पैदावार में भी बढ़ोतरी की जा सकती है। दिल्ली स्थित एक संस्था सैण्ड्रप के समन्वयक हिमांशु ठक्कर का मानना है कि भारत में करीब 240 लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर सिंचित धान की खेती होती है। यदि हम इन सभी जमीनों पर एसआरआई को लागू करते हैं तो हम अपने सिंचित इलाके में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर पाने में सक्षम होंगे। साथ ही इससे धान के उत्पादन में भी 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। दोनों ही वजह आने वाले वर्षों में भारत में जल संसाधन की आवश्यकता के मद्देनजर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेंगे। तो क्या यह सही समय नहीं है कि इसे व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए व्यवस्थित कार्यक्रम चलाया जाए।

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक 5 जुलाई 2009)
(https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjCu5i231khGiU5E_gJ-KwWslHxUpTrWsfema_7FJ7Mp8O6HLQlw_KGpYCjbVbuM-IWbmaKSORRIuGVj7V07Ff4HYH_clqnWflyaNG5YMwiGqU-4WNlfXA9YvBX_ghamQxTVe4qrRWMm0UY/s1600-h/AfterBreak+6+-+12+July+2009_Page_5.jpg)

Tuesday, July 14, 2009

वन समुदायों द्वारा अधिकार के प्रति आह्वान

*बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

दुनिया भर में वनों एवं वन समुदायों का अस्तित्व आज संकट में है। यह संकट सिर्फ पर्यावरण या आर्थिक नहीं है बल्कि यह सभ्यताओं का संकट है। यह दुनिया भर में मूल वनवासियों के सदियों से अर्जित ज्ञान, जीवन शैली, उनकी प्रकृति और आज के पूंजीवादी ज्ञान, ताकनालॉजी, पाशविक प्रवृति के बीच का संकट है। शक्ति, सीमा, मुनाफा, शोषण दुनिया की हर चीज के ऊपर बाजारवाद का अधिकार है। आज की दुनिया में हर कोई एक दूसरे का शोषण करता चाहता है। लेकिन ऐसी सोच के साथ वनवासियों को बाजारवाद में शामिल करने की इच्छा रखने वालों को इनकार का संदेश दिया है वन समुदायों ने।

यह संदेश देश भर के 16 प्रांतो से आए वनवासियों, आदिवासियों, मजदूरों, महिलाओं व पुरूषों ने 10 से 12 जून 2009 को देहरादून में तीन दिनों की गहन चर्चा के बाद दिया। सम्मेलन राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच के नेतृत्व में आयोजित की गई थी। राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच सालों से वन समुदाय के अधिकार के लिए संघर्षरत है जब 2006 में भारत सरकार ने वनाधिकार कानून लागू करने की घोषणा की थी उस समय मंच ने रांची में आयोजित अपने द्वितीय राष्ट्रीय सम्मेलन में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए थे। पहला यह कि वनों पर वनाश्रित समुदायों के स्वशासन को स्थापित करना एवं दूसरा यह कि वनों के बाजारीकरण का विरोध करना। आज एक बार फिर मंच द्वारा आयोजित सम्मेलन में वन समुदायों ने कहा कि, ‘‘हमने तो सदियों से पेड़़ जंगल, हवा, पानी और अन्य वननिवासियों, यहां तक कि जानवरों से भी उनमुक्त रहना सीखा है। लेकिन सीमाहीन रहते हुए भी प्राकृतिक सीमाओं में बंधे रहना जानते हैं। अपने संकटों से निपटने के लिए, अपने मूल्यों के साथ जीने के लिए कानून की राजनैतिक सरंचनाओं की जरूरत नहीं है बल्कि हम वनवासी प्राकृतिक नियमों को जानते और मानते हैं, जो कि सदियों से प्रकृति के साथ रहते हुए हमने सीखे हैं।’’

सम्मेलन में आह्वान आह्वान किया गया कि, ‘‘वनाधिकार कानून हमारी नहीं, हमसे ज्यादा शोषणकर्ताओं की जरूरत है। हम सदियों से जंगलों में हैं। इन जंगलों में हमारे पूर्वजों की आत्मा, हमारे देवता हमारे दोस्त और हमारा-जीवन निहित है। हम हक की बात करने से भी पीछे नहीं हटेंगे लेकिन अगर चंद कागज के टुकड़ों से आप थोड़े से जंगल वन समुदायों का हक मान कर बाकी जंगलों का व्यापार करना स्वीकार नहीं किया जाएगा। जंगल ने हमें सिखाया है कि शक्ति अनंत नहीं होती, शोषण भी अनंत नहीं होता है। हमारे मेहनतकश मजदूर, दलित-आदिवासी इन जंगलों को सिर्फ उपयोग की दृष्टि से नहीं देखते बल्कि उनमें जीवन का संचार भी देखते हैं।’’

देहरादून सम्मेलन के माध्यम से पूरे विश्व के वनवासी, आदिवासी, मजदूर और वन संस्कृति और सोच को समझने और जानने वाले लोगों को एकजुट होकर अपने संघर्षों मे शामिल होने के लिए आह्वान किया गया। साथ ही दुनिया भर में पूंजीवाद के खिलाफ और उनकी लूट के विरोध में चल रहे संघर्षों को तेज करने का आह्वान किया गया। सम्मेलन में वनों एवं वन समुदायों की रक्षा के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसकी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
  • हम व्यक्तिगत अधिकारों से पहले सामुदायिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए सामूहिक रुप से संघर्ष करेंगे।
  • वनाधिकार कानून को लागू कराने के लिए सरकार व जिम्मदेार अधिकारियों के साथ लगातार सम्पर्क व वार्ताएं करगें। कानून के प्रचार प्रसार के लिए सरकार पर दबाव बनाएंगें व अपने संसाधनों से भी इसका प्रचार प्रसार करगें।
  • जंगल की जमीन जिस पर हमारा जन्मसिद्व अधिकार है, और वनाधिकार कानून में भी जिस पर हमारे मालिकाना हक की बात की गयी है, सरकारों द्वारा की जा रही उनके पट्टा वितरण की बात का विरोध करते हुए भूमिहारी के लिए संघर्ष करेंगे। अगर जरुरत पडी़ तो हम सरकार के खिलाफ न्यायालयों में भी जाएंगे।
  • वन टांगिया, गोठ, खटत्ते व घुमंतु समुदाय के तमाम ऐसे वन गांव जिन्हें अभी तक राजस्व का दर्जा नहीं दिया गया है, उन्हें जल्द से जल्द राजस्व के खातों में दर्ज कराने के लिए संघर्ष करेंगे।
  • जंगल में पीढ़ियों से पारंपरिक रुप से मवेशी पालन पर निर्भर रहते हुऐ घुमंतु जीवन व्यतीत करने वाले समुदायों के लोगों व आदिम जनजातियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करंेगे।
  • ऐसे तमाम अभिलेख जिनमें हमारे अधिकार दर्ज किए गए हंै हम उन्हें सरकारी अभिलेखागारों आदि से इकट्ठा करेंगे।
  • जंगल की जमीनों पर हमला करने वाली तमाम कंपनियों को रोकने के लिए आंदोलन करके सरकार पर दबाव बनाएंगे।
  • लघु वनोपज पर अधिकार पाने के लिए इसकी सूचियां बनाएंगे।
  • वनों के बाजारीकरण के खिलाफ संघर्ष को तेज करेंगे।
  • हम जगह-जगह पर वनाधिकार सम्मेलन और जनसुनवाईयों का आयोजन करेंगे।
  • हमारी बात को नहीं समझा गया तो संसद के सामने भूख हड़ताल पर बैठेंगे। घेराव करेंगे।
  • अपनी लड़ाई को जनवादी तरीके से लड़ने के लिए मोर्चाबंदी करेंगे।
  • ऐसे राजनैतिक दल जो हमारे हकांे की बात नहीं करते चुनावों के दौरान उनका बहिष्कार करेंगे।
  • सरकारों द्वारा बरती जा रही लापरवाहियों व कमजोरियों का खुलासा मीडिया के सामने करेंगे।
  • वन विभाग व पुलिस द्वारा वन समुदायों का उत्पीड़न करने पर इनको मंुह तोड़़ जवाब देंगे।
  • हम अपने लक्ष्यों को पाने के लिए सभी इलाकों में अपने संगठनों को मजबूत करेंगे। व सभी संगठनों को एक जगह पर इकट्टा करके अपनी लड़ाई को मजबूती से लड़ेंगे।
  • यह लड़ाई हम अपने समुदाय के नेतृत्वकारी लोगों ‘खासकर महिलाओं’ की अगुवाई में लड़ेंगे।
  • इस तरह से हम वनों पर वन समुदायों का स्वशासन स्थापित करने के अपने मूल लक्ष्य को प्राप्त करने में कामयाबी हासिल करेंगे।

सममेलन में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि जंगल की आग, अवैध पेड़ों की कटाई, बढत़ी गर्मी, घटती वर्षा, इन सारी प्राकृतिक आपदाओं के लिए वनवासियों व आदिवासियों को दोषी ठहराया जाता है और वनवासियों को जंगल से दूर रखने की साजिश रचा जाता है। आप बाघों और वन्य प्राणियों की रक्षा के नाम पर जंगल छोड़ने को कहा जाता है। न्याय के नाम पर यह अन्याय है। यह संकट का समाधान नहीं, विनाश की ओर एक कदम है। कम से कम अपने लिए नहीं तो आने वाली पीढ़ी को इस संकट से बचाने के लिए, पीढ़ी दर पीढ़ी की योजना बनानी ही होगी। दुनिया की सभी सभ्यताओं व वनवासियों को मिलकर यह काम करना होगा। इसलिए प्रकृति के साथ वन समुदायों के रिश्तों को समझने की जरूरत है।

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, नई दिल्ली - 29 जून 2009)
पन्ना चला सरिस्का की राह
*बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश का पन्ना राष्ट्रीय उद्यान 974 वर्ग किमी में फैला हुआ है और भारत का जाना माना बाघ रिजर्व है। माफी चाहता हूं, शायद कभी था! ऐसा इसलिए कि अब यह समाचार अधिकारिक है कि पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में बाघ नहीं बचे हैं जहां करीब 6 साल पहले 40 से ज्यादा बाघ थे। पन्ना में बाघ न होने की पुष्टि मध्य प्रदेश के वन मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने अधिकारिक रिपोर्ट में की है। इससे पहले प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व प्रमुख पी के सेन के नेतृत्व में विशेष जांच दल ने पन्ना राष्ट्रीय उद्यान जाकर मामले की जांच की और अपनी अंतरिम रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी है। दल ने विभिन्न स्तरों पर जांच एवं पूछताछ करने के बाद दावा किया है कि पन्ना में एक भी बाघ नहीं बचे हैं। दल ने जून माह के अंत में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की बात कही है।

तमाम विशेषज्ञ काफी पहले से ही कहते रहे हैं कि पन्ना राष्ट्रीय उद्यान से बाघ पूरी तरह समाप्त हो गए है। अब इसकी स्थिति राजस्थान के सरिस्का पार्क की ही तरह हो चुकी है, जहां पर घोषित तौर पर बाघ की आबादी समाप्त हो चुकी है। मजेदार बात यह है कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण अथॉरिटी एवं वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने मात्र एक साल पहले एक संयुक्त रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की संख्या 24 थी। इसके अलावा जून 2008 में राज्य के मुख्य वन संरक्षक ने कहा था कि पन्ना उद्यान बाघों से भरपूर है। जबकि दिसंबर 2008 में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने अपने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के हवाले से कहा था कि पन्ना में सिर्फ एक ही बाघ है। जबकि मौजूदा सच यह कि कोई बाघ ही मौजूद नहीं है। यदि इन रिपोर्टों को सही माने तो सिर्फ एक साल में ही 24 बाघ कहां लापता हो गए? यदि ये रिपोर्ट सही नहीं है तो फिर राष्ट्रीय स्तर की बड़े बजट वाली इन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठते हैं।

अब राज्य सरकार ने इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान के लिए एक समिति का गठन किया है। परंपरा के अनुसार असफलता का ठीकरा कहीं तो फोड़ा जाएगा। तो इसकी शुरूआत ऊपर के स्तर से होगी और निचले स्तर पर आकर समाप्त हो जाएगी। अर्थात इसके लिए वन विभाग के कर्मचारी या आस-पास रहने वाले ग्रामीणों को दोषी ठहराया जाएगा। लेकिन संरक्षण के तौर-तरीके या कार्य प्रणाली को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा, क्योंकि तौर-तरीके सरकारी विशेषज्ञ एवं नौकरशाह तय करते हैं। चूंकि सरकारी व्यवस्था में बहुत बड़ी रकम खर्च की जाती है तो इस व्यवस्था को गलत ठहरा कर सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाने की गलती क्यों की जाएगी! इस तरह कुल मिलाकर ढाक के तीन पात।

हालांकि विभिन्न स्तरों पर विशेषज्ञों ने संभावित संकट के प्रति चेतावनी दी थी, जिस पर शायद वन विभाग ने ध्यान नहीं दिया। आईयूसीएन द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत में स्तनपायी प्रजातियों की 124 प्रजातियों को बेहद खतरा है। इस सूची में बाघ भी शामिल है। दुनिया के जाने माने वैज्ञनिकों द्वारा तैयार आईयूसीएन की सूची को वन्यजीवों एवं वनस्पतियों के संरक्षण के सिलसिले में बेहद प्रमाणिक और समग्र माना जाता है। सन 2008 की सूची में 44,837 प्रजातियों का आकलन किया गया है, इनमें से 38 प्रतिशत को खतरे में पाया गया है। इसकी वजह उनका शिकार, रहने के वातावरण का नष्ट होना या उसमें बदलाव आना और प्रदूषण है। वातावरण में आने वाले बदलाव भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। इतना ही नहीं केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति ने भी फरवरी 2009 में कहा था कि राज्य स्तर पर संरक्षण की जवाबदेही का अभाव है। लेकिन अफसरशाही में फंसे वन विभाग के पास इसके लिए इच्छाशक्ति नहीं है।

अब वन विभाग ने पन्ना उद्यान में मादा बाघ लाकर फिर से बाघ युक्त करने की कवायद शुरू की है। उद्यान में अब मात्र दो बाघिने हैं जो कि कान्हा राष्ट्रीय उद्यान एवं बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान से लाई गई हैं। जब हजारो वर्ग किमी के क्षेत्र में राष्ट्रीय उद्यान बनाकर विलुप्त हो सकने वाले प्रजातियों को संरक्षित नहीं किया सकता है तो इन राष्ट्रीय उद्यानों के नाम पर तमाम खर्च के क्या मायने हैं? क्या हमें हमें सरिस्का एवं पन्ना से सीख लेने की जरूरत नहीं है?

भारत में वन्यजीवों को संरक्षित करने के लिए वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम-1972 का सहारा लिया जाता है। इस कानून के बावजूद राष्ट्रीय उद्यानों से वन्यजीव लुप्त हो रहे हैं और वनों का विनाश हो रहा है। वन विभाग इस कानून का सहारा लेकर वन संरक्षण के नाम पर सदियों से वनों में रहने वाले आदिवासियों को विस्थापित कर रही है। वास्तव में देखा जाय तो वनों के विनाश का मूल कारण है उसका कुप्रबंधन। सरकार को आदिवासियों को अपने स्वाभाविक आवास क्षेत्र से बेदखल करने के बजाय उनके अधिकार पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए क्योंकि वे ही वनों एवं वन्यजीवों के सही रक्षक साबित हो सकते हैं। हालांकि वनाधिकार कानून 2006 के माध्यम से आदिवासियों को राष्ट्रीय पार्कों एवं संरक्षित वनों में निवास करने का हक है। भारत में करीब 5 लाख लोग अभी भी राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभयारण्यों में रह रहे हैं, जिनके अधिकारों की रक्षा बहुत जरूरी है।

भारत में टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य के तौर पर कुल 436 संरक्षित क्षेत्र हैं। ये बाघ, हाथी सहित विभिन्न दुर्लभ वन्यजीवों एवं जलजीवों के लिए संरक्षित किए गए हैं। तमाम अनुभव गवाह हैं कि स्थानीय समुदायों के सहयोग से संसाधनों का विकास ही हुआ हुआ। सदियों से वनों के साथ रहने से उनके पास वनों को संरक्षित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान व अनुभव मौजूद है। सरकार की कोई भी मशीनरी इनसे बेहतर प्रबंधन नहीं कर सकती है। यदि एक बार इन समुदायों को अपने अधिकारों को इस्तेमाल करने का पूरा मौका दे दिया जाय तो निश्चित तौर पर ये बेहतर परिणाम दिखा सकते हैं।

(प्रकाशित: आफ्टर ब्रेक, नई दिल्ली - 21 जून 2009)

Monday, January 19, 2009

चावल का गणित

  • बिपिन चन्द्र चतुर्वेदी

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में इस बार चावल ही प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा। जबकि बहुत सारे महत्वपूर्ण मुद्दे परदे के पीछे चले गए। आखिरकार ऐसी क्या वजह रही कि चावल के आगे विकास से लेकर भ्रष्टाचार आदि सभी मुद्दे बौने पड़ गए? पांच साल पहले सन 2003 में चुनकर आई भाजपा सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे आने वाले लोगों को 3 रुपये प्रति किलो की दर पर चावल उपलब्ध कराने का वादा किया था। जाहिर है राज्य में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने जनवरी 2008 से 'मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना' लागू किया था। इसका असर यह रहा कि इस बार राज्य में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में गरीब परिवारों को 2 रुपये प्रति किलो की दर से चावल देने का वादा किया था। तो इससे आगे बढ़कर भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में 1 रुपये प्रति किलो की दर से चावल उपलब्ध कराने का वादा कर दिया था। चुनाव से पहले जब मेरा छत्तीसगढ़ जाना हुआ तो मैने स्थानीय लोगों से भावी चुनावी मुद्दों के बारे में बात की थी। बातों का निष्कर्ष यह था कि राज्य में सबसे प्रमुख चुनावी मुद्दा चावल ही होगा। मजेदार बात यह थी कि तब तक किसी भी राजनैतिक दल ने अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी नहीं किया था। लेकिन जब सभी दलों ने चुनावी घोषणा पत्र जारी किया तो चावल को अपने घोषणा पत्र में सबसे प्रमुखता दी। तब मेरी जिज्ञासा और बढ़ी और मैने इस मुद्दे के तह में जाने की सोची। इसके लिए मैने कुछ ऐसे लोगों से बात की जो राज्य के आदिवासी इलाकों में काम करते हैं। तो तस्वीर कुछ और ही उभरकर आई। मालूम हुआ कि आदिवासी इलाके में काफी लोगों को मुफ्त में चावल दिया जा रहा है। सुनने में यह बात बहुत अटपटा लगा कि जो चावल सरकार 3 रुपये प्रति किलो उपलब्ध कराती है वह मुफ्त कैसे दिया जा रहा है?असल में सरकार की योजना मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे आने वाले हरेक परिवार को 3 रुपये प्रति किलो के दर पर प्रति माह 35 किलो चावल उपलब्ध कराना है। और उन्हें यह चावल माह में एक बार एक साथ लेना पड़ता है। इस तरह एक परिवार को चावल लेने के लिए 105 रुपये एकमुश्त देना पड़ता है। राज्य में बहुत सारे गरीब और आदिवासियों की स्थिति ऐसी नहीं है कि वे एकमुश्त 105 रुपये भी दे सकें। ऐसे में राज्य में काफी गरीब परिवार शुरू में चावल की योजना से वंचित रह जाते थे। लेकिन राज्य सरकार का दबाव था कि गरीबों को यह चावल किसी न किसी तरह उपलब्ध कराया जाय। तो जिन लोगों या एजेसिंयों के माध्यम से वह चावल उपलब्ध होता था उन लोगों ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला जिससे न सिर्फ उन गरीबों का काम आसान हो गया बल्कि उससे बहुत सारे दूसरे लोगों को भी लाभ पहुंचने लगा। वितरकों ने आदिवासी इलाकों में प्रति परिवार प्रति माह 35 किलो के बजाय 20 किलो चावल मुफ्त देना शुरू कर दिया। प्रति परिवार शेष बचे 15 किलो चावल को उसी इलाके में सामान्य उपभोक्ताओं को कालाबाजारी के तहत 8 से 10 रुपये प्रति किलो की दर पर बेचा जाने लगा। फिर भी यह बाजार में उपलब्ध होने वाले चावल के मुकाबले सस्ता ही है। इस तरह प्रति परिवार शेष बचे 15 किलो चावल से 120 से 150 रुपये तक वितरक को उपलब्ध होते हैं। उसमें से 105 रुपये सरकारी खाते में जमा करना होता है। शेष बचे रकम में वितरकों, स्थानीय अधिकारियों और कई अन्य स्तरों तक निर्धारित अनुपात में बांट लिया जाता है। इस तरह एक गरीब परिवार जिसकी इतनी क्षमता नहीं है कि वह 3 रुपये प्रति किलो का चावल खरीद सके उसे मुफ्त में चावल मिलने लगा। इसके अलावा बहुत सारे गरीब परिवार रोजगार के लिए साल में आठ महीने अपने गांवों से बाहर रहते हैं। ऐसे में उनके हिस्से का चावल भी बंदरबाट हो जाता है। रमन सिंह की सरकार ने जनवरी 2008 में जब योजना शुरू की थी तो उस समय राज्य के 34 लाख गरीब परिवारों को इस योजना में शामिल किया गया था। यह संख्या राज्य की पूरी आबादी की 65 प्रतिशत हैं। इस तरह योजना से प्रत्यक्ष रूप से राज्य के 65 प्रतिशत लोग लाभान्वित होते हैं। यदि 5 प्रतिशत लोग भी अप्रत्यक्ष तौर पर लाभान्वित होते हैं तो कुल मिलाकर करीब 70 प्रतिशत लोग होते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार योजना के अंतर्गत वितरित होने वाले चावल का 20 प्रतिशत इस तरीके से वितरित होता है। इस पूरे गोरखधंधे में राज्य के सत्ताधीशों के शामिल होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। आखिर जो भी हो, मामला है तो 70 प्रतिशत लोगों के वोट बैंक का। इस मामले में खास बात यह है कि राज्य सरकार को इस योजना के लिए करीब 850 करोड़ रुपये सलाना खर्च करने पड़ते हैं। 'मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना' को लागू करते समय राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार से चावल के अतिरिक्त कोटे की मांग की थी। लेकिन उपलब्ध न हो पाने की स्थिति में खुले बाजार से 14 रुपये प्रति किलो की दर से अतिरिक्त चावल खरीदकर इस योजना के अंतर्गत देना पड़ता है। इस पूरे मामले में सबसे चिंतनीय बात यह है कि राज्य में ऐसे तमाम गरीब आदिवासी परिवार हैं जो एक माह में एकमुश्त 105 रुपये भी व्यवस्था नहीं कर पाते हैं। ऐसे में वे चावल से आगे कहां सोच पाएंगे! वे तो बस इतना ही समझ पाते हैं कि, ''ये सरकार ह हमन ल फोकट में चाउर देथे''। इसके अलावा जो गरीब लोग 3 रुपये प्रति किलो कीमत देकर चावल खरीद भी लेते हें वो भी बाजार की वास्तविक कीमत की सच्चाई से वाकिफ नहीं हो पाते हैं। आखिरकार राज्य के खजाने से प्रति वर्ष 850 करोड़ रुपये लुटाकर वोट बैंक खरीदने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? इससे राज्य के खजाने पर बोझ तो बढ़ेगा ही क्योंकि अबकि बार इससे कम कीमत पर चावल देने का वादा किया गया है। दुखद बात यह है कि जहां भारत में गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों की संख्या कुल आबादी का करीब 26 प्रतिशत है वहीं छत्तीसगढ़ में यह 65 प्रतिशत है। लगता है सरकार इन गरीबों की दशा नहीं सुधारना चाहती। लेकिन चाहे जो हो, इससे राज्य सरकार को सत्ता की ऐसी चावी मिल गई है जो गरीबों को सक्षम बनाने के बजाय उन्हें गरीब बनाए रखने में ही अपना फायदा देखती है।

जनसत्ता, दिल्ली : १३ दिसम्बर, 2008